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बेदर्द ज़माना

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 इस ज़माने में दर्द बहुत है  आइना-ए-ईमान में गर्द बहुत है, कई  दफा दिखी दम तोड़ती इंसानियत, जज़्बात-ए-इन्सां अब सर्द बहुत है.... वक़्त बुरा हो, तब हाथ बढ़ाता नहीं कोई, कहने को तो यूँ यहाँ, हमदर्द बहुत हैं.... मजलूम पर और भी, ढाती है ज़ुल्म दुनिया , जाने क्यों  इन्सां यहाँ ,  बेदर्द बहुत हैं.... -रोली...
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रूमानियत सारी तब फना हो जाती है जब चाँद की जगह रोटी नज़र आती है... तू मुझे स्वप्न में, भी नहीं दिखती है अब, मुफलिसी मेरी, मुझे रुसवा कर जाती है... न सूझती है अब, तेरी  जुल्फों पे शायरी मुझे, भूख दो वक्त की, सब कुछ भुला जाती है.... कैसे लिखूँ गीत मै, लाऊं कहाँ से इक ग़ज़ल, तू भी तो मेरी मुफलिसी से, दामन छुड़ा जाती है... रूमानियत  सारी तब फना हो जाती है, जब चाँद की जगह रोटी नज़र आती है....... -रोली...
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 बेसबब यूँ ही कभी ख़्वाबों में आ जाया करो मोहब्बत तुम भी तो कभी जताया करो हर बात तकरार पर हो ख़त्म,ज़रूरी तो नहीं, प्यार की उलझने और न बढाया करो तुम्हें तो मनाने में ही गुज़र जाता है मेरा वक़्त, रूठने पर तुम भी तो कभी, हमें मनाया करो.... -रोली....
 तेरी आँखों के पानी को, अपनी पलकों में उतार लूँ , ज़िन्दगी की हर ख़ुशी तुझपे वार दूँ  , मेरे अश्कों से गर धुलती हैं गलतियां मेरी, तो लगा कर झड़ी तेरे आँगन में, इक सावन उतार दूँ ............ -रोली...   
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 निशब्द सी रात फिर चली आई है, चाँद संग सितारों को, लपेटे हुए.... मेरे शब्द मौन हैं आज कितने, अनगिनत यादों को खुद में समेटे हुए.... -रोली..
जाड़े का मौसम आने को है... दे रहीं  दस्तक गुलाबी सर्दियां... चाँदनी रातें हो चलीं लम्बी, छुपने लगा है सूरज  जल्दी ही पर्वत तले, शोख गुलाब देखो, इतराने लगा डाल पर , दे रहीं दस्तक गुलाबी सर्दियां.... अलसाई धूप देर से आती है अब मुंडेर  पर, गुनगुनी धूप लगने लगी, भली-भली सी, दे रही दस्तक गुलाबी सर्दियां.... चौके से आ रही महक, सरसों के साग की, माँ का अधबुना स्वेटर  अब सलाइयों पर है, दे रही दस्तक गुलाबी सर्दियां..... -रोली 
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चर्चे  हमारे  आजकल  आम  हो  गए   हैं हम मुफ्त में, बिन कुछ किये बदनाम हो गए हैं.....   झूठे  अफसाने  बयाँ  कर  रहे  हैं  लोग  सच,खुद को करने में हम, नाकाम हो गए हैं इक नज़र भर के देख लिया उनको जो हमने, उस  दिन  से  वो  बेहद  परेशान  हो  गए  हैं .. सोचीं ना थीं जो बातें, कभी हमने ख्वाबों में, मन में दबे-दबे से अब वो, अरमान हो गए हैं... अब  जो  गुज़रते  हैं   कभी  सामने  से वो, जान कर भी बिलकुल अनजान हो गए हैं... बर्दाश्त नहीं हो रही अब उनकी बेरुखी, अब तो वो मेरी मौत का, सामान हो गए हैं....