चाँद से भले हो जाये अनबन रात को तुम्हारी, बस उसकी चाँदनी को तुम नाराज़ ना करना...... हमसे खफा हो भी जाओ तो कोई बात नहीं, खुद से वाबस्ता ख़्वाबों को हमसे जुदा न करना...... -रोली
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एक मासूम से सपने को आज जलते देखा उसके हर इक अरमान को पिघलते देखा कभी मुट्ठी में चाँद-सितारे रखा करती थी वो, आज उसे खुले आसमान तले पलते देखा जानती थी मै ये दुनिया बड़ी ही संगदिल है, इस बार तो हरेक रिश्ते को बदलते देखा कहते हैं तेरे दर पे सिर्फ देर है, अंधेर नहीं फिर क्यों अपनों को ही उसे, निगलते देखा........ -रोली
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साजिशें रकीबों की जो ताड़ ली मैंने, बदनाम मुझे करके काफिर बना दिया...... ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~ इतना खौफनाक ये मंज़र क्यों है हरेक हाथ में नुकीला खंजर क्यों है नफरत सीख ली क्या हर किसी ने, मोहब्बत से शहर ये बंजर क्यों है...... ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~ कतरा के निकल जाते हैं जो आज, वो रकीब कभी हमसे मरासिम की दुहाई दिया करते थे..... -रोली.
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हवायें सारी रात खिड़कियाँ खड़खडाती रही मेरी आँखों से तेरी याद मेरी नींदें चुराती रही... उठा कर उनींदी पलकें,चाँद को ताकते पाया, चाँदनी कहानी मेरी, सितारों को सुनाती रही... झील के ठहरे हुए पानी सा थम गया वक़्त, दूर कहीं कोई माँ, बच्चे को लोरी सुनाती रही... हौले-हौले मोती बन के उतर आयी तेरी याद, बन के आँसू मेरी आँखों में समाती रही........ -रोली....