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सोचती थी ,मन में मेरे , प्रेम शायद अब नहीं है , भूल थी वो, कैसे हो ये, जबकि तन में बसा ह्रदय है, ना यहाँ बंधन वयस का, ना ही वर्षों का समय है , तेरा न होना ही बस इक, मेरे जीवन का तमस है ..... साथ चाहूँ मै तुम्हारा, तुम सूर्य बन हरते रहो तम, धरा और किरणों का तुम्हारी, जैसे हो रहा समागम........... -रोली
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ह्रदय से उठती कसक, सफ़र तय करके पहुँची, जिस्म से रूह तक, यादें बन गयीं आँसू आते-आते नैनो तक..... क्या इस खारे पानी में सिमट कर तुम बह जाओगे !!! या और भी भीतर समा जाओगे, मेरे अंतर्मन तक................! चाहूँ बस जाना तुम्हारे जिस्म के हरेक कतरे में, जीवनदायिनी हर साँस में, हर धड़कन में हर प्यास में, हर कसमो में हर वादों में, तुम्हारे मजबूत इरादों में......................... तब तो रुक जाओगे न तुम !!! फिर कहीं न जाओगे तुम.........! रोक लूंगी,समेट लूंगी,  अब ये आँसू नैनो में..... ना बहने दूँगी  मै, इन स्वर्णिम यादों को...... प्रिय, तुम्हारी यादों को ..... -रोली.
चाँद से भले हो जाये अनबन रात को तुम्हारी, बस उसकी चाँदनी को तुम नाराज़ ना करना...... हमसे खफा हो भी जाओ तो कोई बात नहीं, खुद से वाबस्ता ख़्वाबों को हमसे जुदा न करना...... -रोली
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आधी ज़िन्दगी इंतज़ार में गुजरी और आधी ख्वाबों में गुज़र जाती है... देखती हूँ आइना जब याद करके तुम्हे, मेरी सूरत खुद ही संवर जाती है.... -रोली.
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एक मासूम से सपने को आज जलते देखा उसके हर इक अरमान को पिघलते देखा कभी मुट्ठी में चाँद-सितारे रखा करती थी वो, आज उसे खुले आसमान तले पलते देखा जानती थी मै ये दुनिया बड़ी ही संगदिल है, इस बार तो हरेक रिश्ते को बदलते देखा कहते हैं तेरे दर पे सिर्फ देर है, अंधेर नहीं फिर क्यों अपनों को ही उसे, निगलते देखा........ -रोली
रास्ते होंगे कठिन, हर शै तुम्हें आजमाएगी, हौसले जो दिल में हों मंजिल मिल ही जाएगी... रोली...
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साजिशें रकीबों की जो ताड़ ली मैंने, बदनाम मुझे करके काफिर बना दिया...... ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~ इतना खौफनाक ये मंज़र क्यों है हरेक हाथ में नुकीला खंजर क्यों है नफरत सीख ली क्या हर किसी ने, मोहब्बत से शहर ये बंजर क्यों है...... ~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~ कतरा के निकल जाते हैं जो आज, वो रकीब कभी हमसे मरासिम की दुहाई दिया करते थे..... -रोली.