जेठ माह की तपती किरणें तीखे तेवर सूरज के... तेरी यादें मीठा झरना, मधु घट सी शीतलता दें... स्वेद की बूँदें बनी हों जैसे, सावन की वो प्रथम फुहार... तन-मन जिस में भीग-भीग कर, गुनगुनाये राग मल्हार । स्मृतियाँ जो संग रहें तो, जेठ माह भी सावन है तन हो खारा-खारा तो क्या, मन तो शीतल पावन है । - रोली
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दस्तूर-ए-ज़माना
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वो अल्फ़ाज़ बनके कागज़ पे आहिस्ता से दिल में उतरना.. किताब के बीच रखे अचानक किसी पुराने ख़त का मिलना.. एक-एक लफ्ज़ में किसी की लावा-ए-उल्फ़त का ढलना.. इकरार हो या इनकार हरेक याद को सहेज-सहेज के रखना.. अब न वो बातें, न वो ख़त रहे न रहीं सँभाली हुई कतरनें.. न अब मिलते हैं सूखे गुलाब यादों संग कहीं पन्नों में दबे हुए.. नए ज़माने ने बदले दस्तूर पुराने फ्लोरिस्ट दे जाता है फूल लुभावने.. अब भेजिए इज़हार-ए- मोहब्बत जो हुई क़ुबूल तो सिलसिला चलेगा वर्ना बस "डिलीट मेसेज" का बटन दबेगा । एक ही तो नहीं जिसके लिए, अब ताउम्र कोई इंतज़ार करेगा.. तू नहीं और सही ये सिलसिला चलता रहेगा । - रोली
ये गर्मियाँ
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झुलसन गर्म हवा के थपेड़ों की तपिश तीखी धूप की, ऐसे में ये चुनावी सरगर्मियाँ । ना छाँव दिखती है ना ही शीतल प्याऊ, दिख रहीं बस प्रचार करतीं गाड़ियाँ । जिधर देखो हुजूम है कार्यकर्ताओं का वजूद खो सा गया है आम इंसान का । कुछ को जूनून हैं सुविधाएँ और बढ़ाने का, कुछ को गम है अगले माह के किराने का कुछ हिमालय देखने की योजना बना रहे हैं कुछ बच्चों की फीस की जुगत लगा रहे हैं कोई हनीमून की रंगीनियों में खोया है कोई चुनाव के पश्चात बेसुध सोया है किसी को नहीं मिल रहा रेल में आरक्षण कोई पार्टी की टिकिट न मिलने पे रोया है कोई दुखी है कि पेट्रोल फिर महँगा हुआ कोई खुश है गाड़ी नहीं पास, अच्छा हुआ । नेता कह रहे - महँगाई कम कर देंगे सब सोच रहे, चुनने के बाद क्या ये याद रखेंगे !!! अनपढ़ भी सीख गया है अब नेतागिरी समझ ली उसने भी शब्दों की जादूगरी । नेता जी, पहले पिछले किये वादे तो निभाओ फिर दोबारा हमसे वोट माँगने आओ । हरेक गर्मी को अपनी तरह जी रहा...