Posts

Hi Friends, Im going for vacation tonight for a week. ILL go to Delhi, Amritsar, Wagha border N than Haridwar for Mahakumbh. Wish me luck as Im going to Haridwar on SHAHI SNAN DAY.. Cu on 2nd April...Take care. -ROLI http://wwwrolipathak.blogspot.com/

बचाओ बचाओ पापा बचाओ CARTOON

Image

बंधन

Image
जब साथ हो तेरा प्यारा सा दूरियां क्यों सिमट जाती हैं.... क्यों मेरे बदन से तेरी खुश्बू आती है... क्यों मन को वो बंधन अच्छा लगता है... जैसे अमरबेल किसी वृक्ष से लिपट जाती है... वक़्त क्यूँ तब ठहरता नहीं, उसकी गति और तेज़ हो जाती है. बावरा मन जब चाहता है साथ तेरा.. क्यों वक़्त की रेत, मुट्ठी से फिसल जाती है.... जब साथ हो तेरा प्यारा सा...... दूरियां क्यों सिमट जाती हैं!!!! -रोली पाठक. http://wwwrolipathak.blogspot.com/
Image
मेरे ब्लॉग के सभी सदस्यों को गुडी-पड़वा एवं नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं... -रोली पाठक. http://wwwrolipathak.blogspot.com/

ज़िन्दगी....

एक जिज्ञासा, एक कशमकश, एक अकुलाहट सी है मन में ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में.... खामोश रहूँ या कुछ बोलूं, शब्दों को वाणी में ढालूं ये सोच के कुछ-कुछ घबराहट भी है मन में... बिखरे शब्दों के मोती को, माला में मैंने पिरोया है पढ़-पढ़ के जब-जब देखा है इनके अर्थों को जाना है तब से एक अजब किस्म की राहत सी है मन में.... वाणी भी है संवाद भी हैं पर पर शब्द कहीं खोते से हैं जो शब्द नहीं तो जीवन के अध्याय मेरे रीते से हैं विचलित है,उद्वेलित है,इक उथल-पुथल सी है मन में.. ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में.... - रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/
Image
ना मुस्कुराओ इस कदर ना खिलखिलाओ यूँ जी भर, अब बता भी दो क्या ये है.... मेरी मोहब्बत का असर!!!! -रोली पाठक. http://wwwrolipathak.blogspot.com/

दो रूप..

Image
सोचती हूँ अक्सर वह रूप....... जहाँ रची-बसी मलिन सी महक स्याह दीवारें लहू के लाल छींटों से चितकबरा दामन, आहों-कराहों की बेबसी अँधेरी रातों की गहराई माँ का खाली पेट बूँद-बूँद चुचुआता आँचल, खाली सी एक थाली पपड़ाए-थरथराते होंठ, बेला-चमेली-मोगरे के सुवासित गजरे सीलन भरी रातें दम तोड़ता नन्हा दिया, मुट्ठी में बंद चंद पसीने से भीगे नोट, सोचती हूँ अक्सर............... यह रूप........ महकता-सरसराता रेशमी आँचल अट्टहास व खिलखिलाहट, संगीत संग गीत की स्वर-लहरियों के गूंजते स्वर, रजनीगंधा की मधुर महक भोजन भरपूर पर क्शुधाहीन नारी-नर कोना-कोना दीप्त बड़े झाड़-फानूस से, हैं नयन पर स्वप्न नहीं, है शय्या पर नींद नहीं, भोजन है पर भूख नहीं, आँचल है पर दूध नहीं.... हर निशा जहाँ मधुयामिनी सी है, वहां, करवटें बदलता यह रूप.... और भूख से बेहाल आँखों में स्वप्न संजोये गहरी-मीठी थकी-थकी नींद में डूबा वह रूप..... मै सोचती हूँ अक्सर............. -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/