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भीगी यादें

बरखा के संगीत ने छेड़ दिये फिर मन के तार उमड़-घुमड़ होने लगा कुछ वहाँ, जिसे मन कहते हैं। वो धुन वो उमंग जैसे जलतरंग, जैसे मेघ-मल्हार और बादलों पर सवार मेरा मन। ठंडी बयार हिलोरती ज़ंग लगी यादों की पतीली को, बूंदे गिर-गिर कर  चमका देती उन यादों को जो सर्दी के मौसम में दफन हो चुकीं थीं लिहाफ़ में और गर्मी में  बह चुकी थीं पसीने संग, गरजते-लरजते बादलों ने  जैसे फिर हटाया हो वो लिहाफ़। चमकती दामिनी की  फ्लैश लाईट चमका रही उन उनींदी, अलसायी  यादों को... फिर ताज़ा कर दिया पानी से धुली पत्तियों की तरह फिर झूमने लगीं  घूमने लगीं मन-मस्तिष्क को झिंझोड़ने लगीं.. सच है, बदल देता है मिजाज़ ये बारिश का पानी.. गर्म चाय से उड़ते धुएं में बनती हुई इक तस्वीर मीठे घूँट की तरह  सहलाती हुई सी  मानो अंदर उतर रही। काली बदली बरस रही ऐसे कि छाते का उलट जाना याद आने लगा। भीगते परिंदों में खुद को देखते हुये यादों को मैने समेटा,लपेटा आँखों से शुक्रिया कहा अपनी बरसात के साथ इस बरसात को। - रोली

कहाँ तुम चली गयी.....

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 7 अप्रैल 2021 वो उड़ना जानती थी, पंख नहीं थे तो क्या, उसने आसमान में उड़ना सीखा। फ्लाइंग क्लब जॉइन करके आसमान की ऊंचाइयों को छुआ फिर वहीं उसे जीवनसाथी मिल गया और वो ज़मीन पर उतर आई। बेहद खूबसूरत, खुशमिजाज़, बिंदास, प्यारी, हँसमुख, पक्की सिखणी। बरसों पहले जब मैं पहली बार उसे मिली थी तब वो बला की खूबसूरत थी, एकदम स्टाइलिश। कम बोल रही थी, एकदम हाई-फाई लगी लेकिन अगली कुछ मुलाकातों में पाया कि वो बहुत ही सिम्पल और हम जैसी ही थी। उसे जानवरों से बेइंतहां प्यार था, इतना कि एक दिन उसके घर अपने पैर के पास एक छिपकली को देख कर मैं चीखी - झाड़ू लाओ, मारो इसे। वो उठी, डस्टिंग वाला कपड़ा लाई और छिपकली के ऊपर डाला, उसे पकड़ कर बाहर रख आई और बोली - ''क्यों मारो ! उस बेचारी ने तेरा क्या बिगाड़ा था !'' उसके घर कुत्ता, मछलियां, तोते सब हैं। बाहर की चिड़ियों के लिये दाना-पानी, गली के कुत्तों के लिये रोज शाम को खाना देना, नंदिनी गौ शाला में जा कर गायों की खोज खबर लेते रहना, लॉकडाउन में सड़क के जानवरों के लिए उसने खूब दाना-पानी दिया..यह सब उसकी दिनचर्या में शामिल था। उसके दोस्त उसके दिल के धड़कन थे। चु

फ़र्क

पीरियड्स का दूसरा दिन था, नेहा सुबह से भुनभुना रही थी -  "कोई चीज़ जगह पर नहीं है, कहीं जूते पड़े हैं कहीं मोजे, कहीं कपड़े बिखरे हुए हैं, घर बिल्कुल कबाड़खाना बना रखा है।" नेहा की बड़ी बेटी आर्या ने छोटी बहन पूर्वा को देखा और मुस्कुरा दी। इतने में काम वाली बाई आ गई। "कमला, ये कोई टाइम है आने का..!!! आजकल रोज लेट आ रही हो, काम-वाम करना है या नहीं..!!" कमला बिना जवाब दिए चुपचाप डस्टिंग का कपड़ा उठा कर सफाई में जुट गई। नेहा फिर भी भुनभुनाती रही। आर्या ने चाय बनाई और नेहा के पास आ कर प्यार से बोली - "मम्मा, मूड स्विंग न..!"  "हाँ बच्चा, सेकंड डे है न, बस इसीलिए।" चाय पी के कुछ देर आराम कर के नेहा फिर सामान्य हो गयी। "कमला, कहाँ हो !! ऊपर पूजा वाले कमरे में अच्छे से झाड़ू-पोंछा कर लेना।" "दीदी, तीन दिन बाद कर दूँगी। अभी नहीं कर सकती।" नेहा चुप हो गई। एकदम चुप। - रोली पाठक

वादा न निभाने का दुष्परिणाम

25  अप्रैल 2015 को नेपाल में अचानक धरती हिलने लगी, लोग घबरा गए, बड़ी-बड़ी इमारतें व मकान ताश के पत्तों की तरह ढहने लगे। यह भूकम्प था जिसे रिक्टर पैमाने पर 7.8 व 8.1 तीव्रता का मापा गया जिसने पूरे नेपाल में लगभग 5 दिन तक भारी तबाही मचाई, तकरीबन 9000 लोग मारे गए और 22000 लोग घायल हुए। सैलानियों का स्वर्ग नेपाल उजड़ गया। ललितपुर, भक्तपुर, पाटन जैसे खूबसूरत ऐतिहासिक शहर बर्बाद हो गए। चारों तरफ मलबा और चीख-पुकार थी। हमारा देश भारत, जिससे नेपाल के मधुर संबंध रहे हैं, उसने नेपाल को इस प्राकृतिक आपदा में सांत्वना दी और वादा किया कि वह नेपाल को पुनः खड़ा करेगा। दिन गुज़रने लगे, भारत अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया, उधर नेपाल कराह रहा था। लोगों के घर, आजीविका के साधन, पर्यटन सब उजड़ गया था, ऐसे में दूसरे पड़ोसी चीन ने उसका हाथ थामा और साधन-संपन्न चीन ने साल भर में नेपाल की ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित कर दिया, चमचमाती सड़कें और सुंदर इमारतों का पुनर्निर्माण कर नेपाल के लोगों का दिल जीत लिया। यह चीन की सिर्फ हमदर्दी नहीं थी, कुटिल चाल भी थी। नेपालवासियों को उनका नेपाल लौटा कर चीन उनकी नज़रों में श्र

एक सार्थक विश्व पर्यावरण दिवस।

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इस बार दशकों बाद देश में यह दिवस मनाना सार्थक होगा। प्रदूषण रहित हवा, ध्वनि रहित वातावरण, कचरे से मुक्त जलाशय, कलकल बहती  पारदर्शी नदियाँ, उन्मुक्त स्वच्छ गगन में कलरव करते पंछी। पर्यावरण के जानकार बताते हैं कि लॉकडाउन ने शहरों की हवा हिमालय की तराई सी स्वच्छ व प्रदूषण रहित कर दी है। कोयल की कूक से ले कर विभिन्न पक्षियों का कलरव, उनकी मीठी बोली सुबह हमें नींद से जगाती है। न धूल है न धुआं, न गाड़ियों का शोर। जिस कोरोना वायरस से समूचा विश्व लड़ रहा है, डर रहा है वही प्रकृति के लिये वरदान साबित हुआ। बीते 3 महीनों की हमारी जीवन शैली मजबूरीवश ही ऐसी थी कि किसी ने प्रकृति का कोई अहित नहीं किया किन्तु अनलॉक आरंभ होने के साथ फिर सड़कों पर वाहन दौड़ने लगे हैं। चिमनियां फिर धुंआ उगलेंगी, कारखानों का कचरा फिर नालों के जरिये नदियों को दूषित करेगा। जीव-जंतु, पशु-पक्षी फिर सहम जाएंगे। जीवन की रफ्तार  आवश्यक है, किंतु उस रफ्तार में जीवन हो इसके लिए पर्यावरण सरंक्षण, जल संरक्षण बेहद ज़रूरी है। क्या करें कि जीवन भी चलता रहे, पर्यावरण भी सुरक्षित रहे!!! बहुत सी आदतें बदलनी होंगी हमें। 1. वृक्ष लगाए

विश्व पृथ्वी दिवस

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आज विश्व पृथ्वी दिवस है। इसे पहली बार अप्रैल 1970 में इस उद्देश्य से मनाया गया था ताकि लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। वैश्विक महामारी कोविड-19 के चलते लगभग पूरे विश्व में सन्नाटा है। सड़कें सूनी हैं, धुंआ उगलती चिमनियां शांत हैं, छोटे-बड़े कारखानों, मिलों की मशीन स्थिर हैं। अरबों-खरबों के इस नुकसान के बीच यदि कोई मुस्कुरा रहा है तो वह है - पर्यावरण। प्रदूषण का स्तर पैमाने में बहुत नीचे आ चुका है। भयानक प्रदूषित शहरों में शुमार दिल्ली जैसी जगहों की फ़िज़ां मुस्कुरा रही है। अनेक शहरों में सड़कों पर मोर नाचते व बंदर धमाचौकड़ी करते दिख रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में कंगारू शहर के अंदर आ गए हैं, कहीं पेंग्विन्स पंक्तिबद्ध हो फुटपाथ पर चलती दिखाई दे रही हैं। आबोहवा इतनी साफ हुई कि जालंधर से हिमालय दिखने लगा। यह नतीजा है इंसान के घर मे रहने का। प्रदूषण अत्यंत कम होने के कारण पंछियों का कलरव, कोयल की कूक सारा दिन सुनी जा सकती है। वायु में वाकई प्राण आ गए हैं। कोरोना के भीषण संकट का यह एक विचित्र सुखद पहलू है जिससे पशु-पक्षी आनंदित हैं। पृथ्वी के प्रदूषण से बंद रोमछिद्

बराबर रहें..साथ रहें..

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विश्व महिला दिवस की सभी सखियों को अशेष बधाई एवं शुभकामनाएं। हमारा दिन तो रोज ही होता है, आज का दिन बस उस रोज में से कुछ लम्हे चुरा कर उसे सेलिब्रेट करने का है, अंतर्मन में झांकने का कि - मैं जो भी कर रही हूँ, वह ठीक है न! सही है न! आज का दिन वह है कि जो साल भर हमने घर, परिवार, समाज को दिया है, उनके लिए हमें पुरुस्कृत किया जाये। आज पुरुष हमें मंच पर सम्मानित करते हैं,अहसास दिलाते हैं कि तुम कम नहीं, बराबर हो बल्कि कई बार हमसे बढ़ कर हो। जब पुरुष नारी का सम्मान करते हैं तब उनके बीच विश्वास बढ़ता है, नारी की शक्ति बढ़ती है और पुरुष की ज़िम्मेदारी। दबी,कुचली, रोती, सिसकती, लाचार नारी को अब अक्सर पुरुष ही सहारा दे कर उसे शक्ति का अहसास कराते हैं। उसके आँसू पोंछ कर उसका मनोबल बढ़ाते हैं। समय बदल रहा है, कुरीतियाँ पूरी तरह समाप्त होने में सदियां लगती हैं किंतु आगाज़ हो चुका है एक ऐसे समाज का जहाँ शिक्षा व नई और खुली सोच ने पुरुष को आगे बढ़ाया है कि वह महिलाओं को उनके अधिकार बताये, उनकी शक्ति का अहसास कराए व एक नए समाज के निर्माण में स्त्री को बराबरी पर रखे। माना कि अभी इस तरह का आँकड़ा बहुत