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बेबसी.........

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इच्छाएं अनंत मन स्वतंत्र जीवन परतंत्र...... दायित्व अपार असहनीय भार कैसे हों,स्वप्न साकार.....!!! दमित मन ह्रदयहीन तन विचलित जीवन....... ह्रदय की पीर नयनों के नीर तन, बिन चीर....... अन्न, न जल भूख से विहल दरिद्र नौनिहाल............ माँ की बेबसी तन को बेचती रोटी खरीदती.............. ह्रदय पाषाण व्यथित इंसान हे देश, फिर भी तू महान..........!!! -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

स्वप्न...

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मन की वीणा के तार बजे अधरों पे मेरे गीत सजे नयनों ने नींदों से मिल कर, अभिराम मनोहर स्वप्न रचे... कुछ पीड़ा थी कुछ प्रीति थी कुछ मेरी आप-बीती थी ये अँखियाँ रीती-रीती थीं उन रीती अंखियों में भरकर, नयनों ने नींदों से मिलकर, अभिराम मनोहर स्वप्न रचे इन सपनो में कुछ अपने थे इन अपनों से कुछ शिकवे थे नयनों के सपनो ने शिकवों को, आंसू में बदल कर बहा दिया... इस बहती अश्रुधारा ने, मुझे मीठी नींद से जगा दिया वो सुन्दर सपने छूट गए, वीणा के तार टूट गए और गीत अधर के रूठ गए... उड़ गयी वो निंदिया मीठी सी.. रह गयीं ये अँखियाँ रीती से...रीती सी.... -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

स्मृति-चिन्ह

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अतीत के पन्ने उलटते यूँ ही मिल गया सहसा वो स्मृति-चिन्ह... बना था साक्षी वह, ना जाने कितनी यादों का ना जाने कितने वादों का बच गया कैसे यह समय की कुद्रष्टि से बह ना पाया क्यों ये मेरे नयनों की अतिवृष्टि से... चुक रही थी आस जब, खो चुका विशवास जब, क्यूँ अचानक दिख गया... यह शुष्क आँसू तब... हौले से मैंने उठाया, टूट के वो गया झड़ बरसों पहले विलग हो के, जैसे मै गया था बिखर... थरथराते स्पर्श से पंखुड़ियों को, कुछ यूँ समेटा.. तेरे भीगे आँचल को जैसे तन से हो लपेटा.. हरेक बिखरे कतरे को, पन्नो में फिर दबा दिया भड़कती हुई चिंगारी को एक बार फिर बुझा दिया... यादों की राख तले मैंने, फिर उसे दफना दिया....दफना दिया... -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

यात्रा-वृत्तांत......

मित्रों... नमस्कार, ग्रीष्मकालीन अवकाश के चलते पर्यटन का कार्यक्रम बन गया...अपने शहर भोपाल से हम दिल्ली पहुंचे और वहां से रात को बस का सफ़र करके पहुंचे धर्मशाला...देवभूमि हिमाचल का प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शनीय है, धर्मशाला से कोई १० कि .मी. ऊपर एक क़स्बा है मकलोडगंज,यहाँ हम भागसूनाग में रुके थे, होटल की छत से द्रश्य बेहद मनोरम था, चारों ओर पर्वत, हरी-हरी वादियाँ, देवदार के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों से ढंकी पर्वत श्रंखलायें,पहाड़ की चोटियों पर रुई के फाहे सी बर्फ एवं उन पर अठखेलियाँ करते बादल... अत्यंत सुन्दर द्रश्य प्रस्तुत कर रहे थे! यहाँ का बौद्ध मठ दर्शनीय है, छोटे-छोटे चपटे चेहरे वाले खुबसूरत से लामा बच्चे व बड़े-बुज़ुर्ग चेहरे पर तेज लिए हर जगह घूमते मिल जायेंगे! यहाँ दलाई-लामा का निवास स्थान भी है, ठीक बौद्ध मठ के सामने, बुद्ध पूर्णिमा के दिन उनके दर्शन भी हुए, तिब्बत के काफी लोग मकलोडगंज में रहते हैं, दलाई लामा को भी तिब्बत से चीन द्वारा निर्वासित किये लगभग ५० वर्ष हो चुके हैं, बौद्ध मठ के बाहर भारत के प्रति आभार प्रदर्शन स्वरुप बड़ा सा बोर्ड लगा है- "धन्यवाद भारत", यहाँ अनेक ...

अजन्मी....

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ह्रदय का द्वन्द नहीं ले पा रहा शब्दों का रूप, विचारों की उथल-पुथल नहीं मिलता एक निष्कर्ष भाग रहे शब्द बेलगाम मिलता नहीं छोर कैसे पिरोउं उन्हें.. कहाँ है डोर.....! है मस्तिष्क में संग्राम क्या लिखूं,कैसे लिखूं.. या दे दूं उन्हें विराम...! प्रश्नवाचक चिन्ह खडा है मुह बाये, कैसे ये अजीब शब्द मेरी लेखनी में समायें...?? क्या लिखूं कि कुछ, पढने लायक बन जाये.... एक पंक्ति के लगें हैं चार-चार अर्थ, पा रही आज स्वयं को.. लिखने में असमर्थ.. देखा जो वह ह्रदय को झिंझोड़ गया.. घर के पिछवाड़े नाले में, फिर कोई अजन्मा भ्रूण छोड़ गया.... कब तक होंगी ये कन्या भ्रूण हत्याएं....? बाप तो ना समझेगा.. कब जागेंगी ये मायें.......?? जागो, हे नारी, तुम्हे ही लड़ना होगा... वर्ना अनचाहे भ्रूण को, यूँ ही नालों में सड़ना होगा...... यूँ ही सड़ना होगा..................! -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

गर्मी की छुट्टियां

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(मेरे बच्चे चाहते थे उनके लिए कोई कविता लिखूं, तो अपने बचपन को याद करके कुछ लिखा है, बचकाना सा... ) बैठे-बैठे सोच रही हूँ अपने बच्चों को देख रही हूँ नज़र गडाए टी.वी. पर जो, टॉम एंड जेरी देख रहे हैं... कितना नीरस इनका बचपन, सोच रही हूँ मै मन-ही-मन कहाँ खो गए खेल वो प्यारे, खेले थे मिल हमने सारे, पिंकी-पिंकी व्हाट कलर और पोशम्पा भई पोशम्पा... लुकाछिपी और नदी-पहाड़, और कभी सितौलिया.... घर में पाँव ना टिकते थे बाहर भागे फिरते थे, खेलकूद के हो बेहाल जब, घर को वापस आते थे, पूड़ी-सब्जी आम की लौंजी, मिल बाँट कर खाते थे... लस्सी, पना और गन्ने का रस, रस लेले कर पीते थे... तब ना थे ये थम्स-अप, फैंटा... फ्रूटी, स्प्राईट औ लिम्का.... पढ़ते थे हम चम्पक-नंदन, भरता ना था उनसे ये मन.. चाचा चौधरी और चंदामामा जुपिटर के साबू का कारनामा.. पराग और अमर चित्र कथाएं... अब भी देतीं मुझे सदायें.... कितना प्यारा था वो बचपन नानी के घर का वो आँगन.. बटलोई में डाल उबलती.. चूल्हे पर रोटी थी सिंकती... हर गर्मी में जाते थे हम, मन भर के रह आते थे हम.. बदला अब बच्चों का बचपन टी.वी. कंप्यूटर इनका जीवन जिस दिन सर्वर डाउन र...

म्रत्युदंड .....

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मौत का भय... होता है कितना भयावह, अपने अंतर्मन को कचोटता, ह्रदयगति को सहेजता, कांपते पैरो पर खड़ा लडखडाता चुचुआती पसीने की बूंदों को पोंछता होंठो की थरथराहट अँगुलियों की कंपकंपाहट को काबू करने का असफल प्रयत्न करता... काल को प्रत्यक्ष खड़ा देख.. मन-ही-मन अपने गुनाह... दोहराता.. रक्तरंजित शवो के ढेर, उनके परिजनों के विलाप को याद करता .. दिख रहा है उसे एक काला कपडा, एक फांसी का फंदा और एक जल्लाद... अपनी तरह ही, जो उसका भी, क्रूरता से वैसे ही अंत करेगा जैसा उसने निर्दोषों का किया... तभी पिघले सीसे सी आवाज़ आई उसे म्रत्युदंड दिया गया.... या अल्लाह.... कहाँ गए मेरे वो खैरख्वाह... देते थे जो मोटी तनख्वाह... कहते थे तू जेहादी है... चाहते हम आज़ादी हैं, जो तू ही हमें दिलाएगा.. इस सबाब के काम में, सीधा जन्नत जायेगा.. या अल्लाह... इस दोज़ख से मुझे बचाओ.. जेहाद की इस जंग से, सबको निजात दिलाओ.. मुझे तो दे दी सजा... उनका क्या, जो फिर कई गर्दने तैयार कर रहे हैं... जिनके कारण हम सब सूली पर चढ़ रहे हैं... एक "अजमल कसाब"मर भी गया तो क्या होगा... जड़ें खोदो उनकी, जिनके कारण निर्दोष मर रहे हैं......