(मेरे बच्चे चाहते थे उनके लिए कोई कविता लिखूं, तो अपने बचपन को याद करके कुछ लिखा है, बचकाना सा... ) बैठे-बैठे सोच रही हूँ अपने बच्चों को देख रही हूँ नज़र गडाए टी.वी. पर जो, टॉम एंड जेरी देख रहे हैं... कितना नीरस इनका बचपन, सोच रही हूँ मै मन-ही-मन कहाँ खो गए खेल वो प्यारे, खेले थे मिल हमने सारे, पिंकी-पिंकी व्हाट कलर और पोशम्पा भई पोशम्पा... लुकाछिपी और नदी-पहाड़, और कभी सितौलिया.... घर में पाँव ना टिकते थे बाहर भागे फिरते थे, खेलकूद के हो बेहाल जब, घर को वापस आते थे, पूड़ी-सब्जी आम की लौंजी, मिल बाँट कर खाते थे... लस्सी, पना और गन्ने का रस, रस लेले कर पीते थे... तब ना थे ये थम्स-अप, फैंटा... फ्रूटी, स्प्राईट औ लिम्का.... पढ़ते थे हम चम्पक-नंदन, भरता ना था उनसे ये मन.. चाचा चौधरी और चंदामामा जुपिटर के साबू का कारनामा.. पराग और अमर चित्र कथाएं... अब भी देतीं मुझे सदायें.... कितना प्यारा था वो बचपन नानी के घर का वो आँगन.. बटलोई में डाल उबलती.. चूल्हे पर रोटी थी सिंकती... हर गर्मी में जाते थे हम, मन भर के रह आते थे हम.. बदला अब बच्चों का बचपन टी.वी. कंप्यूटर इनका जीवन जिस दिन सर्वर डाउन र...