बारहवीं का इम्तहान ह्रदय भयभीत मस्तिष्क परेशान... आने वाला है परिणाम क्या होगा.... सोच रहा नादान...!!! आ गया देखो नतीजा हो गया बड़े कॉलेज में दाखिला तगड़ी फीस भरनी होगी पिताजी को और मेहनत करनी होगी, बस एक बार बन जाऊं इंजीनियर, सोच रहा किताब पर गडाए नज़र. पिताजी को इस्तीफ़ा दिलवा दूंगा, कमरे में उनके एसी लगवा दूंगा माँ के सारे काम छुडवा दूंगा दो-दो महरी घर में लगवा दूंगा ना खाने दूंगा बहन को, सिटी बस में धक्के, उसे एक दुपहिया गाडी दिलवा दूंगा. यूँ ही सपने बुनते-बुनते हो गया एक और इंजीनियर तैयार, डिग्री ले कर जहाँ भी जाये, दिखती एक लम्बी कतार, रोज़ रात्रि शय्या पर सोचे, कब तक फिरूँ यूँ बेरोजगार...? कहीं आरक्षण,कहीं तजुर्बा, कहीं सिफारिश चाहिए, डिस्टिंक्शन भी काम ना आये, उन्हें रिश्वत भी चाहिए... दम तोड़ रहीं... आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, इच्छाएं, अभिलाषाएं... क्षीण होती बल्ब की रौशनी की तरह पिताजी के मनोबल की तरह... माँ के आत्मविश्वास की तरह... बहन की अभिलाषाओं की तरह... और उसके जीवन की तरह..................! -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/