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इंसानियत.....

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आदमी आदमी से क्या चाहता है... फकत इंसानियत और वफ़ा चाहता है साथ खेले जो बचपन से अब तक, बन ना जाये वे कहीं दुश्मन लहू के, बस एक यही हौसला चाहता है आदमी आदमी से क्या चाहता है.. खाई थी जिसके चूल्हे की रोटी, उसी आग से घर ना उसका जला दे, बस एक यही वायदा चाहता है... आदमी आदमी से क्या चाहता है.. खाई थी ईद में राम ने सेवई दीवाली में, रहीम ने गुझिया बस यही सब याद दिलाना चाहता है आदमी आदमी से क्या चाहता है.... रोज़े पे राम, पकवान ना खाता रहीम को भूख की, याद ना दिलाता नवरात्रि के फलहार में इधर, रहीम का हिस्सा घर पर आता, राम बस रहीम का साथ चाहता है, आदमी आदमी से क्या चाहता है... मंदिर-मस्जिद के इस मसले से, मज़हब पे राजनीति के हमले से, खुद को दूर, रखना चाहता है आदमी आदमी से क्या चाहता है..... फकत इंसानियत और वफ़ा चाहता है..... -रोली पाठक

आत्महत्या.....

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(विदर्भ में सन 2010 में अब तक 527 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, अब तक सबसे अधिक आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र व कर्नाटक में एवं आंध्र -प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में हुए हैं कहीं सूखा है, कहीं अति वृष्टि, फसल का नुकसान साल भर मेहनत करने वाला किसान सह नहीं पाता, ऊपर से क़र्ज़ लेकर बोहनी करना...! मेरी यह रचना ऐसे समस्त किसानो के परिवारों को समर्पित है...जिन्होंने अपने घर का बेटा, मुखिया, भाई या परिवार का कोई सदस्य खोया है ) सूने-सूने नयन करता चिंतन-मनन बाढ़ की तबाही से उजड़ गया जीवन... डूब गया खलिहान बह गया अनाज कर दिया बाढ़ ने, दाने-दाने को मोहताज.... कब तक पियें बच्चे, चावल का माड़ गीली लकड़ी की जगह, कब तक सुलगे हाड़... हे प्रभु, पहले तो, एक-एक बूँद को तरसाया.. सुन के मेरी गुहार फिर, क्यों मेघों को इतना बरसाया... कि अन्न का एक-एक कण, अतिवृष्टि में जा समाया... नयनों में नींद ना थी ना चैन ह्रदय में पाता था.. रह-रह के परिवार का चेहरा, आँखों के सामने आता था... हार गया,बस हार गया मै, कह कर वो चित्कार उठा... बेबस जान स्वयं को वह मन-ही...

ह्रदय की पीर....

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स्म्रतियों के घेरे से मन के घने अँधेरे से ले चल ऐ वक्त मुझे, दूर कहीं.................. सुरभि से उसके तन की तृष्णा से मेरे मन की ले चल ऐ ह्रदय मुझे, दूर कहीं................ इन गहन प्रेम वीथिकाओं से मेरे मन की सदाओं से ले चल चंचल मन, दूर कहीं................... उस प्रेमरूप की गागर से मेरी पीड़ा के सागर से ले चल अनुरागी चित, दूर कहीं.................... धूप-छाया सा मिलन था दीप-बाती सा बंधन था इस टूटे ह्रदय की पीर से बहते अंखियों के नीर से, ले चल पीड़ित मन, मुझे दूर कहीं............. दूर कहीं.................... -रोली पाठक
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मेरे ब्लॉग के सभी सदस्यों को आज़ादी का ये महापर्व शुभ हो... स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई.... वन्दे मातरम..

कश्मीर की सरकार से गुहार..

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सुलग रहा है मेरा मन क्यों... जल रहा है मेरा तन क्यों..... मेरी बर्फीली वादियों में, नफरत की लगी अगन क्यों.... मेघाच्छादित हिम पर्वत पर, बरस रहें है शोले क्यों....... मेरी शीतल डल-झील का, रंग हो गया रक्तिम सा क्यों.... कहाँ गए वो रंगीं शिकारे, हर इन्सां स्तब्ध सा है क्यों.... देवदार औ चीड पर मेरे, हिमपात नहीं, अंगारे हैं क्यों.... इस गुलज़ार हंसीं घाटी पे, कर्फ्यू का है सन्नाटा क्यों...... धरती पर एक स्वर्ग यहीं था, बना दिया इसे जहन्नुम क्यों.... मात्रभूमि का घूँघट हूँ मै, मेरी तुम लाज, बचाते नहीं क्यों..... और उजाड़ेंगे ये कितना, हैवानो से मुझे बचाते नहीं क्यों........ पास है "पंद्रह-अगस्त" का वो दिन, किन्तु, मुझे आजाद कराते नहीं क्यों... आतंकवाद की बेड़ियों से, तुम निजात दिलाते नहीं क्यों.... हाथों में क्या लगी है मेहँदी, अब हथियार उठाते नहीं क्यों....??? अब हथियार उठाते नहीं क्यों....??? - रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

वसुंधरा......

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नील-श्वेत गगन, हो चला गहन... छा रही घटा सुरमयी, बह रही मदमस्त पवन... रह-रह कर कौंधती सौदामिनी.. दिन में ही मानो, उतर आई यामिनी.. निर्झरिणी की लहरें, कर रही अठखेलियाँ ... खिलखिला रही हों जैसे, चंचल सहेलियां... वसुधा रही बदल, अप्रतिम रूप पल-पल... कभी नवयौवना चंचल, कभी उद्वेलित,कभी अल्हड़... कभी गंभीर कभी उच्छृंखल... रिमझिम-रिमझिम टिप-टिप, मेघ देखो बरस पड़े... देवदार औ चीड़, भीग रहे खड़े-खड़े... मुरझाई प्रकृति में,प्राण आ रहे हैं... पत्ते-पत्ते बूटे-बूटे,मुस्कुरा रहे हैं.. नृत्य कर रहे वृक्ष झूम-झूम.. आभार मानो वर्षा का, कर रहे मुख चूम-चूम... बरस-बरस थक गए श्याम मेघ, हो गया उजला जहां... चार चाँद लग गए, इंद्रधनुष प्रकट हो गया.... अभिभूत हूँ मै देखकर ईश्वर की तूलिका....... ईश्वर की तूलिका....... -रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/

उलझन.......

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विवाह उपरान्त प्रथम सावन..... सीप से स्वप्निल नयन बात जोहते, मन-ही-मन आये पाती बाबुल की, आ रहा रक्षाबंधन... पीहर की देहरी बुला रही, माँ गीत ख़ुशी के गा रही, सखियाँ मेहँदी लगा रहीं, मै पुलकित होती मन-ही-मन... विवाह उपरांत प्रथम सावन...... जाने का उल्लास बहुत है, बँटा-बँटा सा ह्रदय पर अब है, आते जब-जब सामने साजन, तन-मन होता उन्हें समर्पण, है उधेड़बुन में चंचल मन..... विवाह उपरांत, प्रथम सावन......... जाना है होते ही भोर, दे रहीं सदायें रेशम की डोर, क्यों भीग रहे नैनो के कोर, भीतर भी बरस रहा इक सावन... कितना अदभुत है ये बंधन.. सोच रहा अनुरागी मन. विवाह उपरान्त, प्रथम सावन.......... - रोली पाठक http://wwwrolipathak.blogspot.com/