Posts

Image
अजनबी हूँ इस शहर में,  खामोश रहता हूँ.... निगाहें बोलती हैं मेरी... हर दर्द सहता हूँ... ये कैसा रंजो-गम का आलम है, क्यूँ है बेकरारी यहाँ, कि संग अपने दर्द के... मै पिघले सीसे  सा बहता हूँ... अजनबी हूँ इस शहर में, खामोश रहता हूँ.... वीरानियाँ सी छाई हैं,  हर पल उदासी है, न आती मुस्कराहट लबों पर, हर तमन्ना प्यासी है.... क्यूँ कर ज़िन्दगी से फिर भी ना,  कुछ मै कहता हूँ.... अजनबी हूँ इस शहर में, खामोश रहता हूँ...... मुर्दा सा हर इंसान है, हर भावना मृत है.... अब पी लूँ मै विष भी तो क्या, वो भी अमृत है... जो मर-मर के ही जीना है मुझे मुर्दों की बस्ती में, तो बनके मै भी पाषण अब, पत्थर सा जीता हूँ.... अजनबी हूँ इस शहर में,  खामोश रहता हूँ....... - रोली पाठक 
Image
(मदर्स डे पर अपनी व हर माँ को समर्पित ) माँ बनकर ही जाना सच्चा प्रेम किसे कहते हैं.... जिसके आँचल तले बचपन गुज़र गया.... वे हाथ अब भी मुझे आशीष देते हैं... माँ हैं, नानी हैं और दादी हैं वो, हर रूप में वो हमें अथाह प्यार देते  हैं... माँ बनकर ही जाना, सच्चा प्रेम किसे कहते हैं... जब छोटे थे, माँ से प्यार बहुत था, अब जाना माँ का प्रेम, समर्पण,सेवा... रातों को जाग-जाग कर, बच्चों को सपने देते हैं.... माँ बनकर ही जाना, सच्चा प्रेम किसे कहते हैं......
Image
सावन की प्रतीक्षारत परिंदे बैठे हैं शाख पर, जेठ की दुपहरी जला रही उनके पर.... किसी से उम्मीद नहीं, उन्हें दे सके दो बूँद नीर.... मेघ ही जब बरसेंगे तब, हरेंगे  उनकी पीर..... शुष्क कंठ, लाचार आँखों से, ढूंढ रहे दाना-पानी.... मेरी अटारी पे मिट्टी के कुल्हड़ में, रखा है मैंने, शीतल जल, कुछ दाने अनाज के और बहुत सा प्रेम... मेरा स्वार्थ भी है इसमें, मुझे सुनना है उनका कलरव, उनकी चहचहाहट.... देखनी है उनकी क्रीडा..... ऐ परिंदों, हर रोज़ तुम यूँ ही आ जाया करो, अपनी मीठी वाणी में मेरी अटारी पर, मधुर गीत तुम गाया करो........ गीत तुम गाया करो............  
वो ख़ुद एक आफ़ताब है,  क्या ज़रूरत है उसे रौशनी की... बुझा दो इन चिरागों को, कि इनकी रौशनी जाया हो रही है..... -रोली..   
 अपनों के दिए ज़ख्म अक्सर नासूर बन जाते हैं....  वक्त ही होता है मरहम  इस तरह के ज़ख्म का... शूल से चुभ के दिल में जो, जिंदगी में उतर आते हैं.... -रोली......
Image
झूठ फरेब और असली-नकली इस पर ही दुनिया कायम है रिश्वत खोरी, काला-बाजारी, चारों ओर यही आलम है, सत्य के पथ से आते हैं जो, भ्रष्ट भला वो क्यों हो जाते, कुछ ही दूर, सफ़र में अपने, सारे सिद्धांत हैं भूल जाते... आरंभ करते जो अपनी यात्रा, मन में गांधी को बसा कर, ज्यों-ज्यों कारवां बढ़ता जाता, टू-जी,सी.डब्ल्यू.जी. एवं आदर्श घोटाले में जा समाते..... भूल के अपनी सूती धोती, रेशमी वस्त्र में लिपट क्यों जाते.... पहले जनता के साथ खड़े थे, अब क्यों एसी में बैठ बतियाते..... अजब-गज़ब है मनः स्थिति हमारी, किस पर करें हम विश्वास , आज दिया है वोट जिसे, कल वही तोड़ेगा हमारी आस.... कलयुग है यह,छोड़ दो लोगों, आएगा " कलकी " लेकर अवतार, हमें ख़ुद ही उठानी होगी, अपनी दोधारी तलवार.... सोने की चिड़िया के लिए, एक बार फिर देदो जान... सिर्फ कहने से नहीं बनेगा.... - मेरा भारत महान...मेरा भारत महान.....
Image
आओ कुछ ख्वाब बुने... अधूरे से वो ख्वाब... जो पलकों तक न पहुंचे.... उनींदी सी अवस्था में  सोच के दायरे में रह गए.... जिन्हें  ह्रदय ने चाहा.... और सोच बन के जो, विचारों में घुमड़-घुमड़, पलकों में मंडराते रहे..... आज रात वो सारे  ख्वाब, देखना चाहती हूँ मै...... नींद में डूब के उनमे, खोना चाहती हूँ मै..... अपनी अधूरी इच्छाएं, यूँ  पूरी करना  चाहती हूँ  ..... ख़्वाबों के समंदर से , निकाल के चंद लम्हे.... हकीकत बनाकर,  जीना चाहती हूँ  ... हरेक लम्हा...जीना चाहती हूँ......