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नव वर्ष

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जा रहा एक और वर्ष हमसे विलग होकर कई रक्तरंजित देह, छलनी आत्मा देकर हो चुकी वीलीन पंचतत्व में जिसकी  देह माँ उसे पुचकारती थी हौले-हौले से छूकर एक नहीं है, सैकड़ों हैं -  "दामिनी" यहाँ दे रहीं हमको सदाएं जो आज मरमरकर आओ शपथ लें दामिनी को तेज वह  देंगे जैसे चमकती नभ में वैसी शक्ति हम देंगे नव चेतना की वंदना, नारी को हम मुस्कान दें नव जागृति की प्रार्थना नारी को हम सम्मान दें मान दें, सम्मान दें, उसको नयी पहचान दें | - रोली पाठक

|| भावभीनी अश्रुपूर्ण श्रृद्धांजलि ||

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ह्रदय व्यथित है ...शब्द खो गए....मस्तिष्क शून्य है... आशा की लौ बुझ गयी... दामिनी नहीं हारी , हारा है - ये समाज , ये क़ानून और इंसानियत | दामिनी, ईश्वर तुम्हारी बेचैन आत्मा को शांति दें | अब सभी टीवी चैनल्स पर अपील की जा रही है - शान्ति बनाये रखें |  उत्तेजित मत होइए....अपने ज़मीर को कुचल डालिए.... मूक बघिर बन जाइए... आँखें, कान , मुँह , ज़बान सब बंद रखिये.... कोई प्रतिक्रया मत दीजिए.... ये सब होता रहता है.... आज दामिनी है, अमानत है...कल कोई और होंगी.... ये जीवन है ... एक हफ्ते बाद सब सामान्य हो जायेगा... नपुंसक प्रशासन पंगु कानून व्यवस्था | लानत है |  दिल्ली में दस मेट्रो स्टेशन बंद किये गए हैं, नयी दिल्ली में धारा 144 लगा दी गयी है , इण्डिया गेट के रास्ते में पूरा पुलिस बल लगा दिया गया है... ये सब करने से बेहतर आज ही उन हैवानो को फाँसी दे दो....वही होगा आक्रोश व् उत्तेजना का इलाज....  वही होगी दामिनी को सच्ची श्रृद्धांजलि | 6 बलात्कारियों में से एक Juvenile है ..... जिसे ना उम्र कैद की सज़ा दी जा सकती है ना ही फाँसी की, कैसा है ये...

उल्फत

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जलवा-ए-हुस्न कुछ ऐसा है कि, हम पर शामत क्या कहिये.... पलकों की चिलमन गर उठें, लोगों की हालत क्या कहिये ..... आँखों में उल्फत के डोरे , उफ़,ज़िक्र-ए-कयामत क्या कहिये... छुप-छुप कर नज़रों का मिलना, हम पे ये इनायत क्या कहिये ...... बना कर तुझको वो खुद है हैरां , और इश्क-ए-इबादत क्या कहिये ..... कर लूं दुश्मनी खुदा से भी, अब और बगावत क्या कहिये.... - रोली 

दिन-रात

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दिन भर आसमां पर टंगा हुआ सूरज, सांझ ढले टूट रहा... क्षितिज पर पड़ा हुआ दहकता अग्निपिंड सा...... अगन अब ना रही अब तो है शीतलता वहीँ जहाँ मिलन हो रहा अवनि और अम्बर का...... समेटती आलिंगन में अटल पर्वत श्रृंखलाएं, भुला कर अपना तेज, उनकी बाँहों में खो रहा......... ढक रहा तम, उजाला सूर्य का, लो आ गई अब बारी चाँद की.... आ गया हमको लुभाने ले के बारात सितारों की ....... - रोली

नवांकुर

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 धरती में कहीं गहरे में एक बीज बोया हुआ... गुमनाम अँधेरे में सुप्त सोया हुआ... अस्तित्व नहीं भीतर, किन्तु बाहर है जीवन .. अंदर है सिर्फ तम, मिट्टी सर्द और नम ... सूर्य की किरणों संग चमकते उजाले में, चौंधियाती आँखों को, झपकते-मलते हुए फूटा बीज से अंकुर झाँक रहा बाहर, नव गति, नव चेतना संग संघर्ष करने जीवन से आ गया नवांकुर | - रोली

शीशमहल ...

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इक आशियाना हो काँच का..... जहाँ कमरे की छत से धूप आये बरसात में बूंदे बरस-बरस जाएँ सर्दियों का कोहरा रूह तक महसूस हो गर्मी की लू  , बदन थरथराए.... बस एक ऐसा आशियाना हो काँच का............................ लेटूँ रात में बिस्तर पे जब अपने वहीं से बादलों में चाँद नज़र आये काँच की दीवारों से भोर होते ही सूरज की किरणें जगमगाएं .... बस एक ऐसा आशियाना हो  काँच का............................ कमरे से जुगनुओं को चमकते देखूँ गिलहरी को पेड़ पर चढ़ते देखूँ  फूलों पर तितली और भँवरे मंडराएं  महसूस हों जहाँ ये, हर पल दायें-बाएं  हाँ, इक ऐसा आशियाना हो   काँच का.............................. - रोली 

सफर..

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मेरी मुतमुईनी को ज़माने ने बेफिक्री समझा कोई ना समझा ख्वाहिशों की तिश्नगी मेरी मीलों जो चलता जा रहा यह रास्ता लंबा इस स्याह सड़क की ही  तरह है जिंदगी मेरी कहीं उखड़ी कहीं कच्ची कहीं टूटी हुई सी है अकेले दूर तक चुपचाप चलती जिंदगी मेरी रंग इसका स्याह मेरी तकदीर सा ही  है कदमो  तले  दबती  हुई सी जिंदगी मेरी पहुँचाती मुसाफिरों को ये उनकी मंजिलों तक और खुद भटकती रहती है ये जिंदगी मेरी ..... - रोली