तन्हाई
उसका ज़िक्र जो हम, हर रोज किया करते हैं इस बहाने उसमे हम, खुद को जिया करते हैं उसकी बातें वो मुलाकातें और वो यादें प्यारी यूँ मिला कर ज़हर, अमृत में पिया करते हैं वो दरख़्त, जहाँ दस्तखत आज भी हैं दोनों के देख कर उनको, ज़ख्मे-ए-दिल सिया करते हैं तेरी पायल के टूटे घुंघरू, उठाये थे जो चुपके से अब भी सन्नाटे में वो, छम से बजा करते हैं गैर हो तुम, अब ना रहा हक़ तुम पर मेरा लेकिन इंतज़ार तेरे आने का रोज किया करते हैं ना डर इतना , मुझे भी फिक्र है ज़माने की, खुद रुसवा हो के भी तेरी पर्दानशीनी का ख़याल किया करते हैं......... - रोली ...

वाह प्रणव जी,
ReplyDeleteएकदम सही द्रश्य खींचा है आपने...
ट्रेन के आते ही शांत पड़े स्टेशन में
जो आप-धापी व हलचल शुरू हो जाती है
वो याद आ गयी आपका कार्टून देख कर.. :)
बहुत बढ़िया कार्टून....
स्मरणीय ।
ReplyDeleteवाह ......क्या कहे ,,,,बस सच में कमाल है ये...
ReplyDeleteकाबिलेतारीफ बेहतरीन
ReplyDeleteIs ko dekhkar aaj se 35 varsh ka samay yaad aagayaa...kyaa sunder citraN hain....
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