तन्हाई
उसका ज़िक्र जो हम, हर रोज किया करते हैं इस बहाने उसमे हम, खुद को जिया करते हैं उसकी बातें वो मुलाकातें और वो यादें प्यारी यूँ मिला कर ज़हर, अमृत में पिया करते हैं वो दरख़्त, जहाँ दस्तखत आज भी हैं दोनों के देख कर उनको, ज़ख्मे-ए-दिल सिया करते हैं तेरी पायल के टूटे घुंघरू, उठाये थे जो चुपके से अब भी सन्नाटे में वो, छम से बजा करते हैं गैर हो तुम, अब ना रहा हक़ तुम पर मेरा लेकिन इंतज़ार तेरे आने का रोज किया करते हैं ना डर इतना , मुझे भी फिक्र है ज़माने की, खुद रुसवा हो के भी तेरी पर्दानशीनी का ख़याल किया करते हैं......... - रोली ...

शहर जो अब मुर्दा हो चला है .... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति रोली जी ।
ReplyDeleteBadiya
ReplyDeleteशहरों में रहने वालों की यही त्रासदी है ... सजीव चित्रण
ReplyDeleteबहुत बढ़िया रोली जी.
ReplyDeleteसादर
यहाँ सभी अजनबी हैं……शानदार चित्रण्।
ReplyDeleteमहानगरों में अज़नबीपन की त्रासदी का बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण..
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद......आप लोगों की प्रतिक्रया से सदैव उत्साहवर्धन होता है.....शुक्रिया.
ReplyDeleteयथार्थ से जुडी सुन्दर कविता.
ReplyDeleteशुक्रिया शिखा जी......व् मेरे सभी प्रिय मित्रगण....
ReplyDeletebhut hi accha likha apne...
ReplyDeleteसभी यहाँ अजनबी हैं और दो दिन के मेहमान हैं.
ReplyDeleteसुन्दर रचना.
कल 22/06/2011को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है-
ReplyDeleteआपके विचारों का स्वागत है .
धन्यवाद
नयी-पुरानी हलचल
Shukriya aap sabhi ka....
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