तन्हाई
उसका ज़िक्र जो हम, हर रोज किया करते हैं इस बहाने उसमे हम, खुद को जिया करते हैं उसकी बातें वो मुलाकातें और वो यादें प्यारी यूँ मिला कर ज़हर, अमृत में पिया करते हैं वो दरख़्त, जहाँ दस्तखत आज भी हैं दोनों के देख कर उनको, ज़ख्मे-ए-दिल सिया करते हैं तेरी पायल के टूटे घुंघरू, उठाये थे जो चुपके से अब भी सन्नाटे में वो, छम से बजा करते हैं गैर हो तुम, अब ना रहा हक़ तुम पर मेरा लेकिन इंतज़ार तेरे आने का रोज किया करते हैं ना डर इतना , मुझे भी फिक्र है ज़माने की, खुद रुसवा हो के भी तेरी पर्दानशीनी का ख़याल किया करते हैं......... - रोली ...

बहुत खूब ... अच्छी प्रस्तुति
ReplyDeleteवाह ...बहुत खूब
ReplyDeletebhaut hi acchi rachna...
ReplyDeletebhaut khub....
ReplyDeleteWaah....Bahut Khoob...:)))
ReplyDeleteबहुत खूब!
ReplyDeleteबहुत खूब!
ReplyDeletejajbate insa sard bahut h.
ReplyDeletesahne ko yaha marj bahut h.
dikhte nahi mard yaha.
dikhne ko aaj na mard bahut h.
sultan singh jasrasar