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ना लो सब्रे-इम्तेहान अवाम का, गर चिंगारी शोला बन गयी तो, संभाल ना पाओगे........... क्यों कर हवा दे रहे हो इसे, इस आग में खुद ही जल जाओगे.... लटक रहा दारो-रसन अब तुम्हारे ऊपर, कब तक इससे खुद को बचा पाओगे.... देख  लो  अवामे-ज़ारहिय्यत, चले जाओ कि, खानखाह में ही अब तुम बच पाओगे....... (  दारो-रसन : सूली व् फाँसी की रस्सी, ज़ारहिय्यत : गुस्सा , खानखाह : वे गुफाएं जहाँ ईश्वर की इबादत में समय बिताया जाता है ) -रोली....   

जागो भारत जागो.....

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एक जंग है, है एक समर, चल पड़ी क्रांति की लहर, गाँव-गाँव और नगर-नगर बह रही चेतना की बयार.. अब जो ना जागे तो कब जागोगे....................!!! एक युग के तम के बाद ,   उम्मीद उसने जगाई है, मुर्दों की इस बस्ती में इक, चिंगारी भड़काई है.. अब जो ना जागे तो कब जागोगे.....................!!! देह भले ही हो दुर्बल, फौलाद से उसके इरादे हैं,  औरों से और खुद से भी, किये उसने कुछ वादे हैं, भ्रष्टाचार के दानव का, अंत करने की शपथ उठाई है, अन्ना नाम की भारत में, चल रही आज पुरवाई है... अब जो ना जागे तो कब जागोगे.....................!!! अब जो ना जागे तो कब जागोगे.....................!!! -रोली...
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 कान्हा संग लगा के प्रीत हार बैठी मन  अपना.... अब जो देखूँ  पिया को भी.. नज़र आये बैरी कान्हा... रोज़ करती थी श्रृंगार रुच-रुच जब मंदिर में, कान्हा की भोली सूरत हर गई मोरा मनवा , अब ना भाये कोई रंग, बस भाये रंग सांवरा, राधा,मीरा,रुक्मणी से, जले मन बावरा.. चहुँ ओर अब आये नज़र, मेरा मनभावना, मेरा सलोना-सांवला, नज़र आये बैरी कान्हा... -रोली.... कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मेरे सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनायें _/\_
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हर अहसास को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती, गर  होती न मोहब्बत तो ज़िन्दगी, इतनी खूबसूरत नहीं होती..... आँखें बंद करके देखा है जब-जब  तुम्हें,  नींदों में  ख़्वाबों  की भी, ज़रूरत नहीं होती.... मिलकर भी दूर बैठे हो, क्यों ऐसी बेरुखी, यूँ दूरियाँ भी तो कोई , शराफत नहीं होती.... ज़माने का है उसूल, मोहब्बत को रोकना, तेरे लिए जो लड़ लूँ, वो बगावत नहीं होती.. हर अहसास को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती... -रोली...
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  अक्षर-अक्षर पिरो-पिरो कर  याद तेरी दिल में संजो कर... सोच-सोच कर,कुछ शर्मा कर .... सकुचा कर और बड़े जतन कर, आज तुम्हें एक पत्र लिखा है.... प्रिये, तुम्हें एक पत्र लिखा है... विरह की काली रातों का, भूली बिसरी बातों का, तेरी दी सौगातों का, सावन की बरसातों का, इस पाती में वर्णन है.... आज तुम्हें एक पत्र लिखा है.... प्रिये, तुम्हें एक पत्र लिखा है.... स्याही बने मोती अंसुअन के, कागज़ कोरा ह्रदय था मेरा, तेरे ख़याल,अक्षर बन उतरे, जार-जार रोया मन मेरा.... मेरा यही समर्पण है.... आज तुम्हें एक पत्र लिखा है.... प्रिये, तुम्हें एक पत्र लिखा है....
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अहसास बनके तेरी यादों में बसती हूँ... आँसू बनके तेरी आँखों में सजती हूँ... कभी हवा का झोंका बन,किवाड़ खड़खड़खड़ाती  हूँ, कभी गर्म शॉल बन,तन से लिपट जाती हूँ.... जेठ की दुपहरी में नीम की छाया हूँ, आषाढ़ की बूँदों में, छत का साया हूँ, हर पल हूँ साथ तुम्हारे, महसूस करो, मै तो मुस्कान बन, सदा तेरे अधरों पे सजती हूँ... अहसास बनके तेरी यादों में बसती हूँ.....

असली-नकली....

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सभी जीते हैं दोहरी ज़िन्दगी यहाँ, हैरान हूँ रोज़ बदलते चेहरे देखकर... सुनती थी साधू-संत मिलते हैं हिमालय में, प्रवचन दे रहे आज वो, एसी में बैठकर.... वो जिनकी जेबें फटी थीं कल तक, आज नोट उगल रहे उनके लॉकर.... पहचानते नहीं वो आज सुरक्षा घेरे में, आये थे मांगने साथ हमारा, जो कल हाथ जोड़कर.... नकाब उतरा तो शैतान का था चेहरा, आ रही थी ऊपर से जिसपर, मुस्कराहट नज़र...  सभी जीते हैं दोहरी ज़िन्दगी यहाँ, हैरान हूँ मै रोज़ बदलते चेहरे देखकर....