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चिट्ठी ना कोई संदेश.…

 वर्ष 2023 दिन 9 अक्टूबर, एक वर्ष पूर्व, आज ही का दिन ।  पापा गट हॉस्पिटल में आईसीयू में हैं, डॉक्टर गोपेश मोदी जी ने हम तीनों भाई-बहन को बुलाया और कहा - अब सिर्फ़ वेंटिलेटर ही चल रहा है । जैसे ही बाबूजी को वेंटिलेटर से हटायेंगे, वो जीवित नहीं रह पायेंगे । मैं रो पड़ी। सब व्यथित हो उठे, एक उम्मीद थी कि पापा को एक बार तो अच्छा कर के घर ले जाना है लेकिन वह टूटती नज़र आ रही थी। हर संभावना पे विचार किया। डॉक्टर बोले - आप लोग सब कुछ कर चुके हैं और हम लोग भी ।आप सभी के जज़्बे की मैं बहुत कद्र करता हूँ लेकिन हम सभी मजबूर हैं ईश्वर के इस निर्णय के आगे ।हम सभी घरवाले बेहद उदास थे, मम्मी परेशान थीं, निःशब्द थीं। यह रात बहुत भयावह थी क्योंकि डॉक्टर एवं हम सबने पापा के जाने का दिन तय कर दिया था ।एक उम्मीद थी कि क्या पता वेंटिलेटर हटाने के बाद भी वे अपनी मौत से लड़ कर हमारे साथ रह जायें कुछ दिन । लेकिन यह एक झूठ था ख़ुद को बहलाने के लिए । नाना की प्यारी नातिनें आंसू भर-भर रो रही थीं क्योंकि अब हम सब समझ चुके थे कि पापा का अंत निकट है । अगले दिन 10अक्टूबर को सुबह 7 बजे हम तीनों भाई-बहन ...

नन्हीं चिड़िया

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मेरे गमले के एक पौधे में नन्ही सी चिड़िया टेलर बर्ड ने दर्ज़ी की तरह कुशलता से धागों से सिलाई कर, पत्तियों को जोड़-जोड़ के घास-फ़ूस, तिनके पिरो के खूबसूरत सा घोंसला बनाया। कुछ दिन बाद उसमें लाल रंग के चार छोटे-छोटे अंडे नज़र आये। आँधी, तूफ़ान और बारिश से वह डाल ज़ोर ज़ोर से हिलती और मैं बीच-बीच में उन्हें देखती रहती, ज़्यादा पास जाने या मदद करने का मन होते हुये भी नहीं जाती क्योंकि नन्ही चिड़िया घबरा के उड़ जाती थी लगभग दस-बारह दिन बाद घोंसले में झाँका तो देखा वहाँ ज़िंदगी ने कदम रख दिये थे, अत्यंत छोटे मांस के लोथड़े से बच्चे नज़र आये । मैं दूर से देखती मादा और नर चिड़िया बारी-बारी से चोंच में छोटे कीट, पतंगे, इल्ली आदि दबा कर लाते और भूखे बच्चों के खुले मुँह में डाल देते । प्रकृति की लीला अपरंपार है । कुछ दिन में ये बड़े हो कर उड़ना सीखेंगे जो इन्हें माँ ही सिखायेगी और ये भी कुदरत से संघर्ष कर जीना सीख जाएँगे, विशाल नील गगन में उड़ेंगे, पेड़ों की डालों में झूमेंगे, कलरव करेंगे और ये नन्हा सा घरौंदा ख़ाली हो जाएगा । ये सभी चित्र मेरे द्वारा लिए गये हैं । - रोली पाठक   

जननि का महत्व

 सदियां ही नहीं युग बीत गए यह कहते हुए कि समाज पुरुष प्रधान है | कई लोग इस बात पर आपत्ति करते हैं कि काहे का पुरुष प्रधान समाज ! आज की नारी बराबरी की हक़दार है हर क्षेत्र में | मैंने भी यह महसूस किया कि कौन सा क्षेत्र अछूता रह गया नारी से जो यह सोचना पड़ा !  इन दिनों भगवान श्री राम की लहर देश भर में चल रही है | सभी राममय हैं | मेरे मन में यूँ ही विचार कौंधा कि माता सीता की माता कौन हैं ये कौन कौन जानता होगा बिना गूगल किये | जनक दुलारी को सब जानते हैं किन्तु जननि को बहुत कम लोग | उनका नाम है - सुनयना, किन्तु अधिकतर लोग उनका नाम नहीं जानते | मुझे याद आया कि  मेरी बेटी जब पुणे यूनिवर्सिटी में थी तब उसकी मार्कशीट पे सिर्फ उसका नाम व् माता का नाम अर्थात मेरा नाम आता था क्यों वहाँ माता का नाम ही प्रथम आता है | मै बहुत प्रसन्न हुई थी कि कहीं तो माँ को यह अवसर मिला | कहने का तात्पर्य यह है कि माँ आज भी लुकी-छुपी-दबी है और पिता सर्वोपरि हैं, जबकि दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, एक दूसरे के पूरक हैं | बस, यही आशा एवं विश्वास है कि बेटी जनक दुलारी के साथ सुनयना दुलारी भी कहलाई जाये | - रोली ...

एक था कालू !

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कालू से मेरा परिचय लगभग आठ साल पहले हुआ था, उसकी एक आँख बुरी तरह ज़ख़्मी थी तब मेरे सामने रहने वाली डॉग लवर टिक्कू ने उसकी आँख का ऑपरेशन कराया और उसकी वह आँख लगभग बंद हो गई थी, अब वह एक आँख से दुनिया देखता था | निहायत ही शरीफ और सीधा-सादा, काले व कहीं कहीं सफ़ेद रंग के बालों वाला कालू कुछ लोगों का बड़ा दुलारा था | मेरे पास सफ़ेद पॉमेरियन है तो मेरे घर के सदस्यों को कालू से भी विशेष स्नेह था | वह पिछले चार सालों से रात का खाना नियम से हमारे घर ही खाता, कभी वो नहीं आता तो उसकी ढुंढाई मच जाती | कभी उसे दूसरे कुत्ते काट लेते तो हम इलाज कराते, दूध में दवाई पीस-पीस कर उसे खिलाई जाती, घाव पर दवा लगाते, एक हफ्ते में वो फिर से भला चंगा हो जाता | एक साल पहले उसे कैंसर हो गया था तब कैम्पस के एक परिवार ने उसका इलाज कराया, कीमो थैरेपी हुई और एक महीने बाद कालू फिर स्वस्थ हो गया | हम कभी रात को कहीं से लौटने में लेट हो जाते तो कॉलोनी के गेट से कालू हमारी गाड़ी का हॉर्न पहचान कर पीछे पीछे भागता आता और हम सबसे पहले उसे खाना देते | हमारे डॉग हैप्पी से उसकी खासी दोस्ती थी | रात का खाना दोनों के लिए अलग बनता और...

पापा

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 कोविड ने जब सारी दुनिया को दहला रखा था और घर की चारदीवारी में सीमित कर दिया था तब मेरे पापा जो कि घर से 3 किमी दूर रहते हैं, वो रोज दोपहर को घर आते। 78 साल उम्र हो गई किंतु चुस्ती-फुर्ती और उत्साह 50 वर्ष के व्यक्ति जैसा। लाख समझाओ उन्हें कि घर से मत निकलिये, मास्क लगाईये लेकिन वो कहाँ सुनते थे। मेरी दोनो बेटियों से अगाध प्रेम हैं पापा-मम्मी को, वो दोनो भी नाना-नानी पर जान छिड़कती हैं। दोपहर के 1.30 बजते ही पापा कार चला कर घर आ जाते और फिर होती ताश की बाज़ी शुरू। शाम 5 बजे तक ताश खेला जाता, साथ ही पापा की एलेक्सा से गानों की फ़रमाइश चलती रहती, एक डायरी बनाई गई थी जिसमे रमी के पॉइंट्स लिखे जाते, आख़री में टोटल किया जाता कि उस दिन का विनर कौन रहा। यह सिलसिला खूब लंबा चला, तभी पापा भी कोरोना की चपेट में आ गए, 13 दिन अस्पताल में रहे। कमज़ोर भी हो गए थे। फिर शनिवार-इतवार के 2 दिन ताश के लिये मुक़र्रर किये गए। दोपहर के वो 4 घंटे अब हम लोगों के लिए सरदर्द बन गए थे लेकिन पापा को कैसे मना करें, उनका उत्साह तो वैसा का वैसा बरकरार था। ख़ैर, वक़्त गुज़र रहा था, कोविड के बाद जीवन पटरी पर आ रहा था। बड़ी ...

क्या दें उपहार...!!!

 ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें परिवार में, रिश्तेदारी में, मित्रों को या औपचारिक संबंधों को निभाने के लिये उपहार देने का मौका आता है। कहने को तो यह छोटी सी बात है किंतु विचार कीजिये कि ये वाकई एक बड़ा मुद्दा है। हम कई बार सोचते ही रह जाते हैं कि फलां-फलां को क्या उपहार दें और अंत में निरर्थक सा कुछ थमा आते हैं, जिसे लेने वाला भी आगे बढ़ा देता है अर्थात वो भी यूँ ही किसी को थमा देते हैं। याद कीजिये जब कभी आपको उपहार मिलने का अवसर आया तो वे कौन सी वस्तुयें थीं जिन्हें पा कर आप प्रफुल्लित हुए, आपको वह उपहार बेहद उपयोगी लगा या पसन्द आया और वो क्या चीजें थीं जिन्हें आपने देखते ही मन बना लिया कि ये तो किसी को दे देंगे। कुछ बातें दिमाग में रख कर यदि उपहार तय करेंगे तो उसे लेने वाला भी प्रशंसा करेगा। 1. अवसर एवं बजट को ध्यान में रख कर निर्णय लीजिए, साथ ही जिन्हें उपहार देना है उनसे आपके संबंध कैसे हैं - औपचारिक, प्रगाढ़ या रिश्तेदारी !  2. उपहार पहले से तय करें व ला कर रख लें ताकि जल्दबाजी में कुछ भी अनाप-शनाप न ले लें।कार्यक्रम के एक दिन पहले तक हर हाल में उपहार ले आएं एवं उसे खूबसूरती ...

व्यस्तता...

 कितने दिन हो गए कुछ लिखा ही नहीं। विचारों के बादल आषाढ़ के मेघों की तरह दिलो-दिमाग में खूब उथल-पुथल मचाते रहते हैं लेकिन समय ही नहीं कि उन्हें शब्दों में ढाल सकूँ।  बिटिया के विवाह में लगभग एक माह शेष है, दीपावली का महापर्व सिर पर है, घर में एक साथ सफाई, रंगाई-पुताई, बढ़ई के काम सब चल रहे हैं। घर का सामान उलट-पुलट है। कुछ भी व्यवस्थित नहीं ऐसे में विचारों को कैसे एकसार करूँ !!! कभी दर्ज़ी के यहाँ ब्लाउज़ सिलने देना है तो कभी साड़ी में फॉल-पीकू कराना है, कभी मेहमानों की लिस्ट बनानी है तो कभी उनके उपहारों को अलग-अलग नाम लिख कर पैकेट्स बनाने हैं। बीच मे दस-बारह लोगों की चाय बनाओ तो घर मे चाय-नाश्ता-खाना भी चाहिए। बढ़ई बुलायें तो अट्ठारह सीढियां चढ़ कर ऊपर भागो फिर पुताई वाले की सुनने वापस नीचे आओ। इस कवायद में भी विचार कमबख्त शांत नहीं रहते, रोज एक बार मन का दरवाजा खटखटा कर जता ही देते हैं कि हमें भी आकार दो। एक महीने बाद बिटिया का दूसरा घर हो जायेगा। अभी जो कमरा बेतरतीब सा बिखरा पड़ा है, शादी के बाद उसकी अलमारी, आईना, टेबल सब साफ-सुथरे चुप से हो जाएंगे। अभी जो चीख़-पुकार मची रहती है, ये...

दर्द का साल और खुशी के पल

 आज साल के अंतिम पृष्ठ के समापन पर जब इसके पन्ने उलटती हूँ तो दुःख, दर्द, पीड़ा, अवसाद ही अधिक दिखाई देता है। वैश्विक महामारी ने बहुत लोगों को अपना ग्रास बनाया, कुछ रिश्तेदार थे, कुछ परिचित, कुछ पराये और कुछ बेहद अपने और एक थी मेरी बहुत प्यारी दोस्त। पिछले साल आज ही की शाम वो साथ थी, रात 9 बजे से देर रात तक। हमारा नव वर्ष साथ ही मना, क्या मालूम था कि उसके साथ वो आख़री साल होगा। उसे गए 7 महीने हो चुके लेकिन आज भी वो ख़यालों में ज़िन्दा है। हर जगह दिखाई देती है। हर रोज़ याद आती है। मनजीत के जाने के कुछ समय बाद एक-एक करके कई परिचितों के दुःखद समाचार प्राप्त हुए। दूसरी लहर भयावह थी।  रिश्तेदार व परिजन भी कोरोना से पीड़ित थे, अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती। हमने यथासंभव सभी की सहायता की और धीरे-धीरे वे सब स्वस्थ हो कर घर लौट आये।  ईश्वर ने मेरे परिवार पर विशेष कृपा की। हम सब पूर्णतः सुरक्षित रहे।  साल 2021 में गिनती की एकमात्र किन्तु बहुत बड़ी खुशी भी शामिल है - मेरी बेटी की सगाई। एक नया रिश्ता जुड़ना। यह एक ऐसी खुशी है जिसे परिवार के लोगों ने हृदय से महसूस किया। नई पीढ़ी का पहला सम्...

भीगी यादें

बरखा के संगीत ने छेड़ दिये फिर मन के तार उमड़-घुमड़ होने लगा कुछ वहाँ, जिसे मन कहते हैं। वो धुन वो उमंग जैसे जलतरंग, जैसे मेघ-मल्हार और बादलों पर सवार मेरा मन। ठंडी बयार हिलोरती ज़ंग लगी यादों की पतीली को, बूंदे गिर-गिर कर  चमका देती उन यादों को जो सर्दी के मौसम में दफन हो चुकीं थीं लिहाफ़ में और गर्मी में  बह चुकी थीं पसीने संग, गरजते-लरजते बादलों ने  जैसे फिर हटाया हो वो लिहाफ़। चमकती दामिनी की  फ्लैश लाईट चमका रही उन उनींदी, अलसायी  यादों को... फिर ताज़ा कर दिया पानी से धुली पत्तियों की तरह फिर झूमने लगीं  घूमने लगीं मन-मस्तिष्क को झिंझोड़ने लगीं.. सच है, बदल देता है मिजाज़ ये बारिश का पानी.. गर्म चाय से उड़ते धुएं में बनती हुई इक तस्वीर मीठे घूँट की तरह  सहलाती हुई सी  मानो अंदर उतर रही। काली बदली बरस रही ऐसे कि छाते का उलट जाना याद आने लगा। भीगते परिंदों में खुद को देखते हुये यादों को मैने समेटा,लपेटा आँखों से शुक्रिया कहा अपनी बरसात के साथ इस बरसात को। - रोली

कहाँ तुम चली गयी.....

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 7 अप्रैल 2021 वो उड़ना जानती थी, पंख नहीं थे तो क्या, उसने आसमान में उड़ना सीखा। फ्लाइंग क्लब जॉइन करके आसमान की ऊंचाइयों को छुआ फिर वहीं उसे जीवनसाथी मिल गया और वो ज़मीन पर उतर आई। बेहद खूबसूरत, खुशमिजाज़, बिंदास, प्यारी, हँसमुख, पक्की सिखणी। बरसों पहले जब मैं पहली बार उसे मिली थी तब वो बला की खूबसूरत थी, एकदम स्टाइलिश। कम बोल रही थी, एकदम हाई-फाई लगी लेकिन अगली कुछ मुलाकातों में पाया कि वो बहुत ही सिम्पल और हम जैसी ही थी। उसे जानवरों से बेइंतहां प्यार था, इतना कि एक दिन उसके घर अपने पैर के पास एक छिपकली को देख कर मैं चीखी - झाड़ू लाओ, मारो इसे। वो उठी, डस्टिंग वाला कपड़ा लाई और छिपकली के ऊपर डाला, उसे पकड़ कर बाहर रख आई और बोली - ''क्यों मारो ! उस बेचारी ने तेरा क्या बिगाड़ा था !'' उसके घर कुत्ता, मछलियां, तोते सब हैं। बाहर की चिड़ियों के लिये दाना-पानी, गली के कुत्तों के लिये रोज शाम को खाना देना, नंदिनी गौ शाला में जा कर गायों की खोज खबर लेते रहना, लॉकडाउन में सड़क के जानवरों के लिए उसने खूब दाना-पानी दिया..यह सब उसकी दिनचर्या में शामिल था। उसके दोस्त उसके दिल के धड़कन थे। चु...

फ़र्क

पीरियड्स का दूसरा दिन था, नेहा सुबह से भुनभुना रही थी -  "कोई चीज़ जगह पर नहीं है, कहीं जूते पड़े हैं कहीं मोजे, कहीं कपड़े बिखरे हुए हैं, घर बिल्कुल कबाड़खाना बना रखा है।" नेहा की बड़ी बेटी आर्या ने छोटी बहन पूर्वा को देखा और मुस्कुरा दी। इतने में काम वाली बाई आ गई। "कमला, ये कोई टाइम है आने का..!!! आजकल रोज लेट आ रही हो, काम-वाम करना है या नहीं..!!" कमला बिना जवाब दिए चुपचाप डस्टिंग का कपड़ा उठा कर सफाई में जुट गई। नेहा फिर भी भुनभुनाती रही। आर्या ने चाय बनाई और नेहा के पास आ कर प्यार से बोली - "मम्मा, मूड स्विंग न..!"  "हाँ बच्चा, सेकंड डे है न, बस इसीलिए।" चाय पी के कुछ देर आराम कर के नेहा फिर सामान्य हो गयी। "कमला, कहाँ हो !! ऊपर पूजा वाले कमरे में अच्छे से झाड़ू-पोंछा कर लेना।" "दीदी, तीन दिन बाद कर दूँगी। अभी नहीं कर सकती।" नेहा चुप हो गई। एकदम चुप। - रोली पाठक

वादा न निभाने का दुष्परिणाम

25  अप्रैल 2015 को नेपाल में अचानक धरती हिलने लगी, लोग घबरा गए, बड़ी-बड़ी इमारतें व मकान ताश के पत्तों की तरह ढहने लगे। यह भूकम्प था जिसे रिक्टर पैमाने पर 7.8 व 8.1 तीव्रता का मापा गया जिसने पूरे नेपाल में लगभग 5 दिन तक भारी तबाही मचाई, तकरीबन 9000 लोग मारे गए और 22000 लोग घायल हुए। सैलानियों का स्वर्ग नेपाल उजड़ गया। ललितपुर, भक्तपुर, पाटन जैसे खूबसूरत ऐतिहासिक शहर बर्बाद हो गए। चारों तरफ मलबा और चीख-पुकार थी। हमारा देश भारत, जिससे नेपाल के मधुर संबंध रहे हैं, उसने नेपाल को इस प्राकृतिक आपदा में सांत्वना दी और वादा किया कि वह नेपाल को पुनः खड़ा करेगा। दिन गुज़रने लगे, भारत अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया, उधर नेपाल कराह रहा था। लोगों के घर, आजीविका के साधन, पर्यटन सब उजड़ गया था, ऐसे में दूसरे पड़ोसी चीन ने उसका हाथ थामा और साधन-संपन्न चीन ने साल भर में नेपाल की ऐतिहासिक धरोहरों को पुनर्जीवित कर दिया, चमचमाती सड़कें और सुंदर इमारतों का पुनर्निर्माण कर नेपाल के लोगों का दिल जीत लिया। यह चीन की सिर्फ हमदर्दी नहीं थी, कुटिल चाल भी थी। नेपालवासियों को उनका नेपाल लौटा कर चीन उनकी नज़रों में...

एक सार्थक विश्व पर्यावरण दिवस।

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इस बार दशकों बाद देश में यह दिवस मनाना सार्थक होगा। प्रदूषण रहित हवा, ध्वनि रहित वातावरण, कचरे से मुक्त जलाशय, कलकल बहती  पारदर्शी नदियाँ, उन्मुक्त स्वच्छ गगन में कलरव करते पंछी। पर्यावरण के जानकार बताते हैं कि लॉकडाउन ने शहरों की हवा हिमालय की तराई सी स्वच्छ व प्रदूषण रहित कर दी है। कोयल की कूक से ले कर विभिन्न पक्षियों का कलरव, उनकी मीठी बोली सुबह हमें नींद से जगाती है। न धूल है न धुआं, न गाड़ियों का शोर। जिस कोरोना वायरस से समूचा विश्व लड़ रहा है, डर रहा है वही प्रकृति के लिये वरदान साबित हुआ। बीते 3 महीनों की हमारी जीवन शैली मजबूरीवश ही ऐसी थी कि किसी ने प्रकृति का कोई अहित नहीं किया किन्तु अनलॉक आरंभ होने के साथ फिर सड़कों पर वाहन दौड़ने लगे हैं। चिमनियां फिर धुंआ उगलेंगी, कारखानों का कचरा फिर नालों के जरिये नदियों को दूषित करेगा। जीव-जंतु, पशु-पक्षी फिर सहम जाएंगे। जीवन की रफ्तार  आवश्यक है, किंतु उस रफ्तार में जीवन हो इसके लिए पर्यावरण सरंक्षण, जल संरक्षण बेहद ज़रूरी है। क्या करें कि जीवन भी चलता रहे, पर्यावरण भी सुरक्षित रहे!!! बहुत सी आदतें बदलनी होंगी हमें। 1. व...

विश्व पृथ्वी दिवस

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आज विश्व पृथ्वी दिवस है। इसे पहली बार अप्रैल 1970 में इस उद्देश्य से मनाया गया था ताकि लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। वैश्विक महामारी कोविड-19 के चलते लगभग पूरे विश्व में सन्नाटा है। सड़कें सूनी हैं, धुंआ उगलती चिमनियां शांत हैं, छोटे-बड़े कारखानों, मिलों की मशीन स्थिर हैं। अरबों-खरबों के इस नुकसान के बीच यदि कोई मुस्कुरा रहा है तो वह है - पर्यावरण। प्रदूषण का स्तर पैमाने में बहुत नीचे आ चुका है। भयानक प्रदूषित शहरों में शुमार दिल्ली जैसी जगहों की फ़िज़ां मुस्कुरा रही है। अनेक शहरों में सड़कों पर मोर नाचते व बंदर धमाचौकड़ी करते दिख रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में कंगारू शहर के अंदर आ गए हैं, कहीं पेंग्विन्स पंक्तिबद्ध हो फुटपाथ पर चलती दिखाई दे रही हैं। आबोहवा इतनी साफ हुई कि जालंधर से हिमालय दिखने लगा। यह नतीजा है इंसान के घर मे रहने का। प्रदूषण अत्यंत कम होने के कारण पंछियों का कलरव, कोयल की कूक सारा दिन सुनी जा सकती है। वायु में वाकई प्राण आ गए हैं। कोरोना के भीषण संकट का यह एक विचित्र सुखद पहलू है जिससे पशु-पक्षी आनंदित हैं। पृथ्वी के प्रदूषण से बंद रोमछिद्...

बराबर रहें..साथ रहें..

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विश्व महिला दिवस की सभी सखियों को अशेष बधाई एवं शुभकामनाएं। हमारा दिन तो रोज ही होता है, आज का दिन बस उस रोज में से कुछ लम्हे चुरा कर उसे सेलिब्रेट करने का है, अंतर्मन में झांकने का कि - मैं जो भी कर रही हूँ, वह ठीक है न! सही है न! आज का दिन वह है कि जो साल भर हमने घर, परिवार, समाज को दिया है, उनके लिए हमें पुरुस्कृत किया जाये। आज पुरुष हमें मंच पर सम्मानित करते हैं,अहसास दिलाते हैं कि तुम कम नहीं, बराबर हो बल्कि कई बार हमसे बढ़ कर हो। जब पुरुष नारी का सम्मान करते हैं तब उनके बीच विश्वास बढ़ता है, नारी की शक्ति बढ़ती है और पुरुष की ज़िम्मेदारी। दबी,कुचली, रोती, सिसकती, लाचार नारी को अब अक्सर पुरुष ही सहारा दे कर उसे शक्ति का अहसास कराते हैं। उसके आँसू पोंछ कर उसका मनोबल बढ़ाते हैं। समय बदल रहा है, कुरीतियाँ पूरी तरह समाप्त होने में सदियां लगती हैं किंतु आगाज़ हो चुका है एक ऐसे समाज का जहाँ शिक्षा व नई और खुली सोच ने पुरुष को आगे बढ़ाया है कि वह महिलाओं को उनके अधिकार बताये, उनकी शक्ति का अहसास कराए व एक नए समाज के निर्माण में स्त्री को बराबरी पर रखे। माना कि अभी इस तरह का आँकड़ा बहुत ...

मंच के साथ मन में भी सम्मान दें...

8 मार्च को विश्व महिला दिवस के ठीक पहले नारी प्रधान फ़िल्म थप्पड़ आयी। धीमी गति की इस फ़िल्म में एक स्पष्ट संदेश है कि - यदि पुरूष अपनी पत्नी की इज़्ज़त नहीं करेगा तो लाख सुख-सुविधायें व प्रेम भी उसे अस्वीकार्य है। फ़िल्म में अनेक सशक्त महिला किरदारों के अलावा घरेलू काम-काज करने वाली महिला का ज़मीर भी पति के अधीन बताया गया है। एक सफल व समर्पित गृहिणी को भरी पार्टी में पति थप्पड़ मारता है और उसके लिए उसे कोई मलाल भी नहीं क्योंकि उसने नौकरी के तनाव व गुस्से के चलते वह थप्पड़ जड़ दिया था। इसी एक थप्पड़ ने नायिका का वज़ूद ही बदल दिया। हमारे समाज में आज भी महिलाओं पर हाथ उठाने का अधिकार पुरुषों को ही प्राप्त है। अनेक भावात्मक उतार चढ़ाव से गुजरती इस फ़िल्म में भी यही संदेश है कि - हे नारी, जहाँ तुम्हारा सम्मान नहीं, वह जगह तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं। फ़िल्म के दो महिला किरदार, नायिका की माँ व सास रूढ़िवादी हैं परम्पराग्रस्त हैं। उनके अनुसार गृहस्थ जीवन में लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं ऐसे में यदि पति ने हाथ उठा दिया तो बात न बढ़ाते हुए, उसे भुला कर अपनी गृहस्थी पुनः संभालनी चाहिए। एक गृहिणी अपने परिवार के ...

सरकार के कर्तव्य

मुफ्तखोरी । यह शब्द दिल्ली चुनाव में कई लोगों ने अनेक बार कहा। अपने देश-प्रदेशवासियों को मुफ्त गुणवत्ता शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना मुफ्तखोरी नहीं कहलाती। वह भी तब जब  जनता से इन सेवाओं के लिए अतिरिक्त कर न वसूले जाएं। मितव्ययिता से चल कर यदि कोई सरकार अपनी जनता को कोई सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराती है तो यह मुफ्तखोरी जैसे शब्द से परे है। क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर में 43 ऐसे देश हैं जो अपने नागरिकों को व कुछ देश तो विदेशियों को भी लगभग मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं, इनमें सबसे पहला नाम नॉर्वे का है, जो सम्पूर्ण विश्व में सबसे स्वस्थ देश माना जाता है। इसके अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, ब्रूनेई, फिनलैंड, ग्रीस, पुर्तगाल, सिंगापुर, स्वीडन जैसे 43 देश हैं, जहाँ उनके नागरिकों को लगभग मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं । अब मुफ्त शिक्षा की बात की जाए तो बहुत सारे देश अपने नागरिकों को व कुछ देश विदेशियों को भी मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराते हैं। कुछ देशों में आरम्भ से उच्च् शिक्षा तक मुफ्त है व अनेक देशों में अलग अलग स्तर पर। कोई आरंभिक शिक्षा मुफ्त देते हैं, कोई...

पुकार

न जलाओ दोबारा इस जली देह को, होता है दर्द यूँ बार बार जलने में, अब तो तपती हूँ मैं, लौ से भी मोमबत्ती की, सिहर जाती हूँ कर्कश आवाज़ों से, जो चीखते हो तुम मेरे न्याय के लिए, न होता है कुछ न मिलता है कुछ बस, बढ़ता ही जाता है देह का दर्द। कल दूसरी थी, आज हूँ मैं, कल फिर दूसरी होगी क्या थमेगा यह सिलसिला कभी!!! - रोली पाठक

न हो भयभीत, लड़ो...

उस जली हुई बेटी की देह को जब पिता अंतिम संस्कार के लिए अग्नि देने लगे तो वह बोल उठी - 'पापा, दोबारा मत जलाइए, बहुत दर्द होता है।' प्रियंका, खूबसूरत, प्रतिभाशाली, भावुक, भावुक इसलिए कि वह बेज़ुबान जानवरों की तकलीफ समझती थी, समाज से भयभीत, भयभीत इसलिए कि अपनी बहन को अंतिम शब्द यही थे उसके कि मुझे डर लग रहा है, आँखों में भविष्य के अनगिनत सुनहरे सपने होंगें, ऐसी लड़की को चार अनपढ़, नशेलची, आवारा किस्म के लोगों ने अपनी हवस का शिकार बना कर जला कर फेंक दिया। माता-पिता, बहन उसके घर लौटने की राह देख रहे होंगे, माँ ने रोज की तरह उसका भी खाना बनाया होगा, बहन ने आखरी बार बात कर के उसे हौसला दिया था, लेकिन मन में शंका आ गयी थी किसी अनहोनी की, क्योंकि उसने अपना भय व्यक्त कर दिया था कि उसे डर लग रहा है वहाँ मौजूद लोगों से। इस दर्दनाक हादसे के बाद पूरे देश में आक्रोश पनपा, धरने,प्रदर्शन, नेताओं के बयान आने लगे, मोमबत्तियां जल जल कर पिघलने लगीं। हत्यारों को तुरन्त सज़ा व मृत्युदंड की आवाज़ चारों ओर से उठी। तभी एक निर्णय आया दिल्ली की एक अदालत से  कि 2012 में हुए निर्भया कांड के आरोपी का डेथ वार...
पैर सिकोड़े,मोड़े हाथ सर्दियों में कोई नवजात धूप में लेटाने पर जैसे लेता खुल कर अंगड़ाई है वैसे ही हफ्तों बाद आज धूप आई है... पौधे जो खूब ऊब चुके थे बारिश में पूरा डूब चुके थे सुरमई मेघों के छंटने से सूरज के खुल कर हंसने से दे रहे खुश दिखाई हैं क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आयी है... मुंडेरों पर कपड़े सूख रहे दरवाज़े खिड़की खुल गए कमरे की सीलन सिमट रही हो रही घरों में सफाई है क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आई है... गद्दे भी थे गीले-गीले बिस्तर भी थे सीले-सीले बारिश के निशां दीवारों पर धब्बे जैसे काले-पीले सूरज की गर्मी से सबने  अब कुछ राहत पायी है क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आई है... - रोली