Tuesday, July 11, 2017

आतंक का कोई धर्म नहीं होता

अमरनाथ यात्रा पर कल रात हमला हुआ, 7 लोग मारे गए जिनमे 5 महिलायें थीं । खबर पाते ही राजनेता सक्रीय हो गए । ट्वीट होने लगे । कट्टरपंथी हिन्दू भड़काऊ बयानबाज़ी करने लगे । सबकी नज़रों में यह हमला हिन्दू धार्मिक यात्रा पर हुआ था और इसकी ज़िम्मेदार पूरी मुसलमान कौम है ।
कुछ ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों ने कहा कि हज यात्रा जब तक आराम से व सुरक्षा से होती रहेगी, हिंदुओं की तीर्थ यात्रा में रोड़े आते रहेंगे ।
मन खिन्न हो गया । लगा कि क्यों नहीं बंटवारे के समय ही ये बंटवारा हो गया था कि तुम अपने मुल्क में, हम अपने देश में । क्यों लोग अपनी मिट्टी की चाहत में यहाँ और वहाँ रह गए । जब जनता प्रेम से रहने लगती है तब ये स्वार्थी नेता क्यों पेट्रोल डाल डाल कर अग्नि की ज्वाला को खूब भड़काने लगते हैं !
पढ़े लिखे लोग ये भूल जाते हैं कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता । ये वो सिरफिरे हैं जिन्हें बचपन से कट्टरता की घुट्टी पिलाई है, अल्लाह को खुश करने के लिए खुद को बम बना कर खून-ख़राबा कर के जन्नत नसीब होने का सपना दिखाया है ।
वो ये भूल जाते हैं कि अगर इनका कोई धर्म होता तो क्या ये अपनी कौम के लोगों को भी मारते ? पाकिस्तान में भी अनेक आतंकी हमले होते रहते हैं ।
आर्मी स्कूल के छोटे छोटे बच्चे भी बख्शे नहीं गए ।
भारत में शहीद होने वाले जवानो में मुसलमान भी होते हैं । हाल ही में मस्ज़िद के बाहर मारे गए डीएसपी भी मुस्लिम थे ।
देश के हर मुसलमान को अपना दुश्मन समझने वाले क्यों मुरीद हैं बिसमिल्ला खां साहब की शहनाई के ? क्यों युसूफ खान उर्फ़ दिलीप कुमार आज भी हर दिल अज़ीज़ हैं । क्यों शाहरुख़, सलमान, सैफ जैसे ढेरों मुसलमान अभिनेताओं  के प्रशंसक हैं ? सानिया मिर्ज़ा की विजय पर भारतवासियों के सीने गर्व से फूल जाते हैं ? क्यों मोहम्मद अज़हरुद्दीन वर्षों क्रिकेट टीम के कप्तान रहे ? क्यों हिंदूवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन व उपाध्यक्ष अब्बास नकवी हैं ? क्यों अब्दुल कलाम देश के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति रहे ? क्यों एक मुसलमान सैनिक अब्दुल हमीद भारत पाकिस्तान युद्ध में शहीद होते हैं और शौर्य व वीरता के लिए सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र पाते हैं ? ये देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों का । कुछ स्वार्थी व अनपढ़ कट्टर मूर्खों के कारण पूरी कौम कैसे कटघरे में खड़ी कर दी जाती है ?
कोसना है तो आतंकवादियों को कोसिये अन्यथा रहना ही छोड़ दीजिए मुसलमानो के साथ । क्या एक बार फिर बंटवारा संभव है ? नहीं, और गर नहीं तो हर आतंकी हमले के बाद अपने पड़ोस के रहमान चाचा से कैसा गिला ?
नफरत इस हद तक बढ़ा दी गयी है कि हर मुसलमान आतंकवादी नज़र आता है लेकिन ये मत भूलिए कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता । हाल ही में आईएसआई से मुक्त हुए एक प्रान्त मोसल में एक भगोड़े आतंकवादी की पत्नी ने अपने दुधमुंहे बच्चे को गोद में लेकर सुरक्षा बल के करीब जा कर ट्रिगर दबा कर स्वयं को उड़ा लिया, तीन जवान मरे और वह स्वयं अपने बच्चे के साथ मारी गयी । ये कैसी कट्टरता है ? इतनी नफरत एक औरत, एक माँ के मन में कहाँ से आई ? ज़रा सोचिये, कौन हैं ये ? ये सामान्य लोग नहीं हैं । ये साइको हैं, ज़ेहाद का नाम ले कर बनने वाले आतंकवादी हैं ये । इन्हें पहचानिए । इनका कोई धर्म नहीं । न ही ये मुसलमान हैं । ये सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी हैं ।

- रोली पाठक

Friday, July 7, 2017

बबूल के फ़ूल

बबूल कहते ही
काँटों की व्यथा सुनाई देती है
नहीं सोचता कोई
उसके तीखे काँटों के सिवा कुछ और
देखे हैं मैंने लेकिन
आषाढ़ की बयार में
झूमती इतराती शाखों पर
खिले इठलाते रुई के फाहे से
पीले बबूल के फ़ूल ।

- रोली

Friday, June 17, 2016

कुछ कुछ होते देखा ..

कुछ पाते कुछ खोते देखा ,
जीवन को यूँ रोते देखा,
हर पल बदला हाल समय का,
हर दिन कुछ-कुछ होते देखा ...
खुली हुयी अंखियों से मैंने,
खुद को ही सोते देखा ...

धूप कभी,कभी छाँव घनेरी,
दर्द थे उसके, पलकें मेरी ,
जेठ माह में मैंने अक्सर,
सावन में खुद को भिगोते देखा...
चुपके-चुपके यूँ भी अक्सर
मैंने खुद को रोते देखा...

रात की श्यामल ख़ामोशी में,
नींद की अलमस्त मदहोशी में,
पलकों में अटके ख्वाबों को,
आंसू बन के पिघलते देखा ...
बादल पे अपने  पाँव जमा कर
मैंने खुद को चलते देखा....

- रोली