Tuesday, September 12, 2017

सुरक्षा की गुहार निजी स्कूलों के लिए ही क्यों...!!!!

गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल में सात वर्षीय छात्र प्रद्युम्न की हत्या के बाद सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के निजी स्कूलों की जाँच करने का फैसला किया है । क्या देश के सारे बच्चे निजी स्कूलों में ही पढ़ते हैं ?  या उनके अभिभावकों द्वारा मोटी फीस की अदायगी इसका महत्वपूर्ण कारण है ! यदि सरकारी स्कूलों की बात करें तो वैसी अव्यवस्था तो कहीं नहीं मिलेगी । हजारों गांवों में विद्यालय के नाम पर ऐसी दुर्दशा है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । इमारत के नाम पर जर्जर भवन, शौचालय जैसी प्राथमिक आवश्यकता का अभाव, न साफ़ पानी की व्यवस्था, न ही शिक्षकों की, इसके बावज़ूद इन स्कूलों में लाखों बच्चे पढ़ते हैं । सरकार अपनी योजनाओं के तहत मिड डे मील जैसी सुविधाएँ प्रदान कर पल्ला झाड़ लेती है, किन्तु उस मिड डे मील के दुष्प्रभाव हम आये दिन अख़बारों में पढ़ते रहते हैं । कभी दूषित दलिया खा कर बच्चे बीमार हो जाते हैं कभी अस्पताल में भर्ती । ऐसे भी हज़ारों गाँव मिलेंगे जहाँ विद्यालय हैं ही नहीं , जिसके चलते बच्चे कई किलोमीटर की दूरी तय कर के विद्यालय जाते हैं, कहीं बीच में नदी पर पुल न होने के कारण तैर कर, नाव से या रस्सी के जीर्ण-शीर्ण बनाये गए पुल पर जान जोखिम में डाल कर बच्चे पढ़ने जाते हैं । ऐसे में सरकारी विद्यालयों की ओर से आँख मूँद कर निजी स्कूलों पर पूरा ध्यान केंद्रित कर ये सौतेला व्यवहार क्यों ! कहा जा रहा है कि निजी स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा के लिए ज़ारी दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है,क्या सरकारी स्कूलों के लिए सुविधाएं उपलब्ध करना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं ?
रेयान इंटरनेशनल जैसे बड़े व नामचीन स्कूल में भी प्रशासन व जनता तभी हरकत में आयी जब एक बच्चे की जान चली गयी । इन स्कूलों की, इनके वाहनों की सुरक्षा को लेकर कोई न कोई दुर्घटना घटने पर आये दिन चर्चा होती रहती है, किन्तु इस बार अमानवीय कृत्य ने लोगों को झकझोर दिया । सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेना पड़ा । प्रद्युम्न के पिता की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, हरियाणा सरकार व सीबीएसई को नोटिस भेजकर तीन हफ्ते में जवाब माँगा है ।
इसी मामले में मानव संसाधन विकास मंत्री श्री जावड़ेकर ने एक विचित्र सुझाव दिया - स्कूलों व् स्कूल बसों का स्टाफ ज़्यादातर महिलाएं हों, ड्राइवर भी । क्या अपराध की रोकथाम करने के लिए पुरुष वर्ग को हर जगह से हटा देना ही एकमात्र उपचार है !!!
खैर, पुनः मुद्दे पर आते हैं, उच्चतम न्यायालय के अनुसार - बच्चों की सुरक्षा किसी एक स्कूल का नहीं,पूरे देश का मामला है । क्या यह वक्तव्य सिर्फ निजी स्कूलों के लिए दिया गया है ? या सरकारी स्कूलों में भारी अव्यवस्थाओं के बीच पढ़ रहे नौनिहालों की भी कोई सुध लेगा जिनके नाम पर केंद्र से करोड़ों रुपयों का बजट दिया जाता है ।
वर्तमान में शिक्षा सबसे बड़ा व्यवसाय व उद्योग है, क्योंकि जबसे निजी स्कूल बढ़े हैं, सरकारी विद्यालयों में ज़्यादातर कमज़ोर वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं , यहाँ तक कि आम आदमी समर्थ न होते हुए भी किसी तरह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा व सुविधाएं प्रदान करने के लिए निजी स्कूलों में ही भेजता है । इस मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय को केंद्र व राज्य सरकारों को भी फटकार लगाना चाहिए क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी इसी देश के हैं, उनका भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना निजी स्कूलों में मोटी फीस देने वाले बच्चों का ।
संभवतः कुछ महीनों में आहिस्ता-आहिस्ता स्थितियां बेहतर हो जाएँ, किन्तु देश के उन हजारों जर्जर, अव्यवस्थित सरकारी विद्यालयों की सुध कौन लेगा, या उन्हें भी किसी बड़ी दुर्घटना के घटित होने के बाद याद किया जायेगा !!!

- रोली पाठक

Tuesday, July 11, 2017

आतंक का कोई धर्म नहीं होता

अमरनाथ यात्रा पर कल रात हमला हुआ, 7 लोग मारे गए जिनमे 5 महिलायें थीं । खबर पाते ही राजनेता सक्रीय हो गए । ट्वीट होने लगे । कट्टरपंथी हिन्दू भड़काऊ बयानबाज़ी करने लगे । सबकी नज़रों में यह हमला हिन्दू धार्मिक यात्रा पर हुआ था और इसकी ज़िम्मेदार पूरी मुसलमान कौम है ।
कुछ ज़्यादा पढ़े लिखे लोगों ने कहा कि हज यात्रा जब तक आराम से व सुरक्षा से होती रहेगी, हिंदुओं की तीर्थ यात्रा में रोड़े आते रहेंगे ।
मन खिन्न हो गया । लगा कि क्यों नहीं बंटवारे के समय ही ये बंटवारा हो गया था कि तुम अपने मुल्क में, हम अपने देश में । क्यों लोग अपनी मिट्टी की चाहत में यहाँ और वहाँ रह गए । जब जनता प्रेम से रहने लगती है तब ये स्वार्थी नेता क्यों पेट्रोल डाल डाल कर अग्नि की ज्वाला को खूब भड़काने लगते हैं !
पढ़े लिखे लोग ये भूल जाते हैं कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता । ये वो सिरफिरे हैं जिन्हें बचपन से कट्टरता की घुट्टी पिलाई है, अल्लाह को खुश करने के लिए खुद को बम बना कर खून-ख़राबा कर के जन्नत नसीब होने का सपना दिखाया है ।
वो ये भूल जाते हैं कि अगर इनका कोई धर्म होता तो क्या ये अपनी कौम के लोगों को भी मारते ? पाकिस्तान में भी अनेक आतंकी हमले होते रहते हैं ।
आर्मी स्कूल के छोटे छोटे बच्चे भी बख्शे नहीं गए ।
भारत में शहीद होने वाले जवानो में मुसलमान भी होते हैं । हाल ही में मस्ज़िद के बाहर मारे गए डीएसपी भी मुस्लिम थे ।
देश के हर मुसलमान को अपना दुश्मन समझने वाले क्यों मुरीद हैं बिसमिल्ला खां साहब की शहनाई के ? क्यों युसूफ खान उर्फ़ दिलीप कुमार आज भी हर दिल अज़ीज़ हैं । क्यों शाहरुख़, सलमान, सैफ जैसे ढेरों मुसलमान अभिनेताओं  के प्रशंसक हैं ? सानिया मिर्ज़ा की विजय पर भारतवासियों के सीने गर्व से फूल जाते हैं ? क्यों मोहम्मद अज़हरुद्दीन वर्षों क्रिकेट टीम के कप्तान रहे ? क्यों हिंदूवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन व उपाध्यक्ष अब्बास नकवी हैं ? क्यों अब्दुल कलाम देश के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति रहे ? क्यों एक मुसलमान सैनिक अब्दुल हमीद भारत पाकिस्तान युद्ध में शहीद होते हैं और शौर्य व वीरता के लिए सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र पाते हैं ? ये देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों का । कुछ स्वार्थी व अनपढ़ कट्टर मूर्खों के कारण पूरी कौम कैसे कटघरे में खड़ी कर दी जाती है ?
कोसना है तो आतंकवादियों को कोसिये अन्यथा रहना ही छोड़ दीजिए मुसलमानो के साथ । क्या एक बार फिर बंटवारा संभव है ? नहीं, और गर नहीं तो हर आतंकी हमले के बाद अपने पड़ोस के रहमान चाचा से कैसा गिला ?
नफरत इस हद तक बढ़ा दी गयी है कि हर मुसलमान आतंकवादी नज़र आता है लेकिन ये मत भूलिए कि आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता । हाल ही में आईएसआई से मुक्त हुए एक प्रान्त मोसल में एक भगोड़े आतंकवादी की पत्नी ने अपने दुधमुंहे बच्चे को गोद में लेकर सुरक्षा बल के करीब जा कर ट्रिगर दबा कर स्वयं को उड़ा लिया, तीन जवान मरे और वह स्वयं अपने बच्चे के साथ मारी गयी । ये कैसी कट्टरता है ? इतनी नफरत एक औरत, एक माँ के मन में कहाँ से आई ? ज़रा सोचिये, कौन हैं ये ? ये सामान्य लोग नहीं हैं । ये साइको हैं, ज़ेहाद का नाम ले कर बनने वाले आतंकवादी हैं ये । इन्हें पहचानिए । इनका कोई धर्म नहीं । न ही ये मुसलमान हैं । ये सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी हैं ।

- रोली पाठक

Friday, July 7, 2017

बबूल के फ़ूल

बबूल कहते ही
काँटों की व्यथा सुनाई देती है
नहीं सोचता कोई
उसके तीखे काँटों के सिवा कुछ और
देखे हैं मैंने लेकिन
आषाढ़ की बयार में
झूमती इतराती शाखों पर
खिले इठलाते रुई के फाहे से
पीले बबूल के फ़ूल ।

- रोली

Friday, June 17, 2016

कुछ कुछ होते देखा ..

कुछ पाते कुछ खोते देखा ,
जीवन को यूँ रोते देखा,
हर पल बदला हाल समय का,
हर दिन कुछ-कुछ होते देखा ...
खुली हुयी अंखियों से मैंने,
खुद को ही सोते देखा ...

धूप कभी,कभी छाँव घनेरी,
दर्द थे उसके, पलकें मेरी ,
जेठ माह में मैंने अक्सर,
सावन में खुद को भिगोते देखा...
चुपके-चुपके यूँ भी अक्सर
मैंने खुद को रोते देखा...

रात की श्यामल ख़ामोशी में,
नींद की अलमस्त मदहोशी में,
पलकों में अटके ख्वाबों को,
आंसू बन के पिघलते देखा ...
बादल पे अपने  पाँव जमा कर
मैंने खुद को चलते देखा....

- रोली