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बेदर्द ज़माना

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इस ज़माने में दर्द बहुत है  आइना-ए-ईमान में गर्द बहुत है,

कई  दफा दिखी दम तोड़ती इंसानियत,
जज़्बात-ए-इन्सां अब सर्द बहुत है....

वक़्त बुरा हो, तब हाथ बढ़ाता नहीं कोई,
कहने को तो यूँ यहाँ, हमदर्द बहुत हैं....

मजलूम पर और भी, ढाती है ज़ुल्म दुनिया ,
जाने क्यों  इन्सां यहाँ ,  बेदर्द बहुत हैं....


-रोली...
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रूमानियत सारी तब फना हो जाती है
जब चाँद की जगह रोटी नज़र आती है...

तू मुझे स्वप्न में, भी नहीं दिखती है अब,
मुफलिसी मेरी, मुझे रुसवा कर जाती है...

न सूझती है अब, तेरी  जुल्फों पे शायरी मुझे,
भूख दो वक्त की, सब कुछ भुला जाती है....


कैसे लिखूँ गीत मै, लाऊं कहाँ से इक ग़ज़ल,
तू भी तो मेरी मुफलिसी से, दामन छुड़ा जाती है...

रूमानियत  सारी तब फना हो जाती है,
जब चाँद की जगह रोटी नज़र आती है.......


-रोली...