Friday, April 30, 2010

दो बैल...


कल मर गया
किशनू का बूढा बैल,
अब क्या होगा...
कैसे होगा...
चिंतातुर,सोचता-विचारता
मन ही मन बिसूरता
थाली में पड़ी रोटी
टुकड़ों में तोड़ता
सोचता,,,बस सोचता...
बोहनी है सिर पर,
हल पर
गडाए नज़र,
एक ही बैल बचा...
हे प्रभु,
ये कैसी सज़ा...!!!
स्वयं को बैल के
रिक्तस्थान पे देखता..
मन-ही-मन देता तसल्ली
खुद से ही कहता,
मै ही करूँगा...हाँ मै ही करूँगा...
बैल ही तो हूँ मै,
जीवन भर ढोया बोझ,
इस हल का भी ढोऊंगा
कितनी भी विपत आये,
फसल अवश्य बोऊंगा...
खाट छोड़ ,मुह अँधेरे ही..
निकल पड़ा खेत की ओर,
दो बैल जोत रहे खेत,
होने लगी देखो भोर.........
- रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

Thursday, April 15, 2010

वीरगति


सन्नाटे की साँय-साँय
झींगुर की झाँय-झाँय
सूखे पत्तों पे कीट की सरसराहट
दर्जनों ह्रदयों की बढाती घबराहट
हरेक मानो मौत की डगर पर...
चलने को अग्रसर...
पपडाए होंठ सूखा हलक
ज़िन्दगी नहीं दूर तलक
चाँद की रौशनी भी
हो चली मद्धम जहाँ..
ऐसे मौत के घने जंगल हैं यहाँ,
हाथ में बन्दूक,ऊँगली घोड़े पर
ह्रदय है विचलित पर स्थिर है नज़र..
ना जाने और कितनी साँसें लिखी हैं तकदीर में..
एक बार फिर तुझे देख लूं तस्वीर में..
जेब को अपनी टटोलता-खंगालता,
बटुएनुमा एक वस्तु निकालता,
हौले से उसके पटों को खोलता,
मन-ही-मन उस तस्वीर से बोलता,
सन्नाटे से डरता,
आवाज़ से घबराता,
मन-ही-मन वो है बुदबुदाता,
छूट जाये जो साथ अपना,
तो गम ना करना...
माँ-बाबू और बच्चों को संभालना,
आँख तुम नम ना करना..
ना जाने ये दानव जीने देंगे या नहीं..
मै अपना, तुम अपना फ़र्ज़ अदा करना..
रह गया अधूरा ये वार्तालाप
सन्नाटे को चीरती आई मौत की आवाज़..
धंस गयी कलेजे में उसके वह गोली..
कोई और नहीं वे थे नक्सली...
गिरा बटुआ एक ओर
भीग गए नैनो के कोर
चारों ओर है दावानल
चीखों और मृत्यु का शोर
ज़िन्दगी मानो उससे दूर जा रही है...
एक मीठी सी नींद आ रही है...
प्रिये, इस जनम में अपने देश का क़र्ज़ चुकाया
अगले जनम तुम्हारा चुकाऊंगा
यदि तुम चाहोगी तो तुम्हारा सहचर
बनकर फिर आऊंगा...
दुआ करना हमारे वतन में हो तब अमन औ शांति...
वर्ना फिर किसी जंग की भेंट चढ़ जाऊंगा...............!!!
- रोली पाठक
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Tuesday, April 13, 2010

मेरी नन्ही परी....


नन्ही सी कोमल कली
रुई के फाहे सी सफ़ेद
घुंघराले काले केशों के संग
मानो श्याम मेघों के
बीच चंदा,रहा दमक...
आसमान सी नीली
पोशाक में लिपटी..
इन्द्रनुषी आभा सी दमकती..
मेरे आँचल में चमकती...
नयनों की डिबिया को
झप-झप झपकाती..
कस के बंद
गुलाबी मुट्ठियों को
हिलाती-डुलाती
अलि सी गुनगुन में
गुनगुनाती-इठलाती
मुझे मातृत्व का
एहसास कराती...
परीलोक की मेरी ये शहज़ादी
मानो मुझसे पूछती सी...
माँ तू नाराज़ तो नहीं
की मै बेटी हूँ...!!!!!!!
पलकों से उसे सहला के
आंसुओं से मैंने उसे नहला के
गर्व से गोद में उठा कर
हजारों चुम्बन बरसा कर
हौले से कहा उसे-
बिटिया...मेरी तरह तू भी..
एक बेटी, एक बहिन, एक गृह-लक्ष्मी और..
एक माँ होगी.
समझेगी तू ही
मेरी हर पीड़ा को...
हमारी दुलारी है तू
पिता की प्यारी है तू
रौशन होगा तुझसे ही
अपने घर का हर कोना
हर त्यौहार में तू ही
रचेगी-बसेगी...
तेरी किलकारी से
हमारी दुनिया सजेगी...
जब-जब तू खिलखिलाएगी
बिटिया हमारी दुनिया जगमगाएगी....

-रोली पाठक
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Monday, April 12, 2010

मध्यम वर्ग का कीड़ा


मुट्ठी में फडफडाते नोट
देख कर
डूबा हुआ है वो
यह सोच कर..
क्यूँ ना हूँ मै
इतना गरीब
कि फटेहाल भी
रह सकता
रोटी-प्याज भी
खा कर
जी सकता..
ना होते पडोसी
ना रिश्तेदार
ना किसी के सवाल
ना जवाब...
फक्कडपन से रहता
रोज़ कुआं खोद के
पानी पीता...
फटे कपडे पहन कर
शान से घूमता...
फिर ख्याल आया उसे....
या तो होता इतना अमीर
कि इन मुट्ठी में बंद
रुपयों को
भीख में दे सकता...
ना पेट की होती चिंता
ना अपनों की फिकर
दीवार पर चिपके होते
नोट वॉल-पेपर पर...
खाने की थाली
सोने की होती
जिसमे भोजन होता
रत्न, जवाहर, माणिक का...
लेकिन मै हूँ एक कीड़ा
समाज के ऐसे वर्ग का
जहाँ
इतने से रुपयों में ही
पेट की आग, तन की सज्जा...
माँ की दवाई, पत्नी की लज्जा..
बेटे की कोचिंग
बेटी की पढाई
बनिए का राशन
दूध का बिल और
मकान की इ.एम्.आई.
सब का करना होगा हिसाब
ये मुट्ठी भर नोट
किस-किस काम आएंगे...!!!
क्यूँ पैदा हुआ मै..
इस मध्यम वर्ग में
जहाँ इन मुट्ठी भर नोट में ही
मर मर के जीना होगा...
और ज़िन्दगी भर
कर्ज़दार बन कर
रहना होगा...

Thursday, April 8, 2010

आस्तीन के सांप हैं ये....


गृहमंत्री जी का यह बयान कि नक्सलवादियों पर इसलिए
वायुसेना से हमला नहीं किया जा सकता क्योंकि वे देश के
दुश्मन नहीं हैं, बड़ा विचित्र है! चिदंबरम साहब, ये तो देश
के दुश्मनों से भी ज्यादा खतरनाक हैं, जो अपने होते हुए
भी अपनों का लहू बहा रहे हैं! क्या देश का नागरिक अपराध
करे तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा! आइ.पी.सी. की
धारा ३०२ के तहत कोई हत्या करता है तो क्या उससे सजा
नहीं दी जाती?? तो इन क्रूर नक्सलवादियों से हमदर्दी क्यों??
या किसी और बड़ी घटना का इंतज़ार है?? या ये समझा जाये
कि कोई वी.आई.पी. नहीं मारा गया इनके हाथों अभी तक, इसलिए
इन्हें फिलहाल माफ़ी है...!!!!!अगर ये भारत देश को अपना
समझते तो क्या सी.आर.पी.ऍफ़. के जवानों की यूँ हत्या करते???
इस के पहले भी ना जाने कितने निर्दोष लोगों की जान ले चुके
हैं ये! मंत्री जी, बयान नहीं कठोर कदम उठाइए इनके विरुद्ध...
आस्तीन के सांप हैं ये....!

Tuesday, April 6, 2010

महाकुम्भ का तीसरा शाही स्नान


महाकुम्भ का पावन अवसर...उस पर चैत्र पूर्णिमा व हनुमान जयंती...
और शाही स्नान! जहाँ एक ओर भारत के कंदर-गुहाओं, जंगल-पर्वतों
से निकल-निकल कर साधू-संत हरिद्वार आये हुए हैं वहीँ आस्था एवं
गंगा का तीव्र प्रवाह भीड़ की शक्ल में "हर की पैड़ी" पर उमड़-उमड़
जा रहा है! जीवन में कितने भी पाप किये हों, गंगा मैया की एक डुबकी
उद्धार कर देगी! सारे पाप धुल जायेंगे, इस विश्वास के साथ जन-समूह उमड़ा
पड़ रहा है, जिसमे अधिकतर ग्रामवासी हैं!प्रातः काल ३ बजे से आम लोगों
का स्नान आरंभ हुआ, आज जो गंगा मैया में स्नान करेगा वह सीधा बैकुंठ
जायेगा! हिमगिरी से निकली गंगा का हिम सा शीतल जल भी लोगों के निश्चय
को डिगा नहीं पा रहा था....प्रातः ९ बजे तक ये स्नान चला उसके पश्चात्
अखाड़ोंका स्नान आरंभ होगा! जूना अखाडा, निर्मल अखाडा, निरंजन अखाडा,
अग्नि अखाडा,महानिर्वानी अखाडा, अटल अखाडा, आनंद अखाडा एवं अन्य
साधू-संतों के ये समूह बड़े-बड़े सजे-धजे रथों,गाड़ियों,हाथी-घोड़े में सोने-चांदी
से सुसज्जित सुन्दर छत्र लगाये अपने गुरुओं के साथ आपने अखाड़ों का वैभव
के साथ शक्ति प्रदर्शन करते हुए शान से हर की पैड़ीस्थित ब्रम्ह कुंड की ओर
कूच कर रहे हैं!आज हरिद्वार में कोई वाहन नहीं चल रहा है, सभी को पद
यात्रा करनी है,ना रिक्शा,ना ऑटो,वहां के रहवासियों की गाड़ियों पर भी
पाबंदी है क्योंकि आज शाही-स्नान है! सिर्फ अखाड़ों की गाड़ियाँ चलेंगी...बस!
९ बजे आमजन को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण घाट की सफाई की गई!
अब आरंभ हुआ अखाड़ों का शाही-स्नान! नागा साधू हर अखाड़ों का मुख्य
आकर्षण होते हैं,तन पर भस्म लपेटे, उलझी लम्बी-लम्बी जटायें,
माथे पे रक्त-चन्दनका लेप,हाथ में चिमटा,त्रिशूल-भाले या अन्य कोई
हथियार लिए अपने-अपने अखाड़े की अगुवाई करते नाचते-झूमते शिव बारात
से ये शिवगण हर-हर गंगे, बम-बम भोले का जयकार करते चले जा रहे हैं...
साँय ६ बजे तक अखाड़ों का स्नान चला, फिर शुरू हुई गंगा मैया की आरती...
अदभुत द्रश्य!गंगा-जल में नन्हे-नन्हे असंख्य दीपक तैरते हुए विहंगम द्रश्य
उत्पन्न कर रहे हैं....पवित्र गंगा मैया की पावन ओजपूर्ण आरती समाप्त हुई
और पुनः रात्रि ८ बजे आमजन का स्नान आरंभ हुआ, जो देर रात्रि चला....
साधू-संतों द्वारा स्नान किये गए ब्रम्ह कुंड का महत्त्व और बढ़ गया!
अगाध श्रद्धा, ईश्वर के प्रति गहरी आस्था, विश्वास एवं भक्ति का समागम देखने मिला!
प्रशासन पूरी तरह चुस्त,चौकन्ना एवं सावधान! भारी भीड़ किन्तु कहीं कोईअव्यवस्था नहीं..!
बाहर से आये सभी तीर्थ-यात्रियों की यथासंभव सहायता करने को पुलिस एवं प्रशासन!
महाकुम्भ के तीसरे शाही स्नानमें शामिल हो पाने का ये सुखद अनुभव सदा याद रहेगा!

-रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/