Thursday, March 25, 2010

Hi Friends,
Im going for vacation tonight for a week.
ILL go to Delhi, Amritsar, Wagha border N
than Haridwar for Mahakumbh. Wish me luck
as Im going to Haridwar on SHAHI SNAN DAY..
Cu on 2nd April...Take care.

-ROLI
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Wednesday, March 17, 2010

बंधन


जब साथ हो तेरा प्यारा सा
दूरियां क्यों सिमट जाती हैं....
क्यों मेरे बदन से
तेरी खुश्बू आती है...
क्यों मन को वो बंधन
अच्छा लगता है...
जैसे अमरबेल किसी
वृक्ष से लिपट जाती है...
वक़्त क्यूँ तब ठहरता नहीं,
उसकी गति और तेज़ हो जाती है.
बावरा मन जब चाहता है साथ तेरा..
क्यों वक़्त की रेत,
मुट्ठी से फिसल जाती है....
जब साथ हो तेरा प्यारा सा......
दूरियां क्यों सिमट जाती हैं!!!!

-रोली पाठक.
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Monday, March 15, 2010


मेरे ब्लॉग के सभी सदस्यों को
गुडी-पड़वा एवं नव-वर्ष की
हार्दिक शुभकामनाएं...

-रोली पाठक.
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ज़िन्दगी....

एक जिज्ञासा, एक कशमकश, एक अकुलाहट सी है मन में
ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में....

खामोश रहूँ या कुछ बोलूं, शब्दों को वाणी में ढालूं
ये सोच के कुछ-कुछ घबराहट भी है मन में...

बिखरे शब्दों के मोती को, माला में मैंने पिरोया है
पढ़-पढ़ के जब-जब देखा है इनके अर्थों को जाना है
तब से एक अजब किस्म की राहत सी है मन में....

वाणी भी है संवाद भी हैं पर पर शब्द कहीं खोते से हैं
जो शब्द नहीं तो जीवन के अध्याय मेरे रीते से हैं
विचलित है,उद्वेलित है,इक उथल-पुथल सी है मन में..
ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में....

- रोली पाठक
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Sunday, March 14, 2010




ना मुस्कुराओ इस कदर
ना खिलखिलाओ यूँ जी भर,
अब बता भी दो क्या ये है....
मेरी मोहब्बत का असर!!!!

-रोली पाठक.
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Friday, March 12, 2010

दो रूप..



सोचती हूँ अक्सर
वह रूप.......
जहाँ रची-बसी
मलिन सी महक
स्याह दीवारें
लहू के लाल
छींटों से चितकबरा दामन,
आहों-कराहों की बेबसी
अँधेरी रातों की गहराई
माँ का खाली पेट
बूँद-बूँद चुचुआता आँचल,
खाली सी
एक थाली
पपड़ाए-थरथराते होंठ,
बेला-चमेली-मोगरे
के सुवासित गजरे
सीलन भरी रातें
दम तोड़ता नन्हा दिया,
मुट्ठी में बंद चंद
पसीने से भीगे नोट,
सोचती हूँ अक्सर...............
यह रूप........
महकता-सरसराता
रेशमी आँचल
अट्टहास व खिलखिलाहट,
संगीत संग
गीत की
स्वर-लहरियों के
गूंजते स्वर,
रजनीगंधा की मधुर महक
भोजन भरपूर पर
क्शुधाहीन नारी-नर
कोना-कोना दीप्त
बड़े झाड़-फानूस से,
हैं नयन पर
स्वप्न नहीं,
है शय्या
पर नींद नहीं,
भोजन है पर
भूख नहीं,
आँचल है पर
दूध नहीं....
हर निशा जहाँ
मधुयामिनी सी है,
वहां,
करवटें बदलता यह रूप....
और भूख से बेहाल
आँखों में स्वप्न संजोये
गहरी-मीठी थकी-थकी
नींद में डूबा वह रूप.....
मै सोचती हूँ अक्सर.............
-रोली पाठक
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निवेदन..........



आओ तनिक तुम मेरा श्रृंगार कर दो
इन लजीले रीते-रीते से नयनों में
साकार हों ऐसे कुछ स्वप्न भर दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रृंगार कर दो...

देखो ये आँचल बड़ा बेरंग सा है
टेसू के कुछ फूल ला कर इसे रंग दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रंगार कर दो....

मेरे तन सजता नहीं है इक भी गहना
चाँद-सूरज ला के इन कुंडल में जड़ दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रृंगार कर दो....

पलकों पे कुछ ओस की बूँदें सजी हैं
तुम गए, तबसे ये नयनों में बसी हैं
काली घटाओं का काजल इनमे रच दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रंगार कर दो...

व्यथित हूँ पायल मेरी बजती नहीं है
अपने चंद गीत इन घुंघरू में भर दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रंगार कर दो....

शुष्क से मेरे इस मरू ह्रदय को...
प्रेम की बूंदों से तुम अभिसिंचित कर दो
आओ तनिक तुम मेरा श्रृंगार कर दो.....

-रोली पाठक
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Tuesday, March 9, 2010

महिला आरक्षण का प्रथम चरण विजयी...


जीत गयी फिर नारी शक्ति
असुरों की फिर हार हुई,
था श्रृंगार कभी चूड़ी का
आज वही तलवार हुई,
मूक-बघिर है उसका जीवन
ज्यों ही उसको बोध हुआ,
ओज वाणी में ऐसा आया,
मानो धनुष टंकार हुई
अबला,महिला,वनिता, कामिनी
कहलाया करती थी वो..
दुर्गा,चंडी,चामुंडा का
साक्षात अवतार हुई..
क्षीण ध्वनि और कातर द्रष्टि,
सहमा-सहमा था तन-मन,
आज मिली है शक्ति उसको
दुनिया में जयजयकार हुई..
जीत गयी फिर नारी शक्ति,
असुरों की फिर हार हुई...
-रोली पाठक.
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रातों को नींद नहीं आती
दिन भी यूँ ही ढल जाता है
गलती से तेरा जो,
ज़िक्र निकल आता है

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Monday, March 8, 2010

चन्दा की डोली



हर रात की अजब कहानी है
कभी अमावस कभी है पूर्णिमा..
हर रात चन्द्रमा की नयी है भंगिमा
पूनम का चाँद लगे एक गहना
नाज़ुक सी कलाई में मानो
कंकण हो पहना
बिखरे हैं तारे जैसे गोरी की चूनर
चन्दा लगे जैसे माथे पे झूमर
बादलों से लुक-छिप जैसे गोरी शर्माए
घुंघटा उठाये और उठा के गिराए
पिया संग जैसे करे अठखेलियाँ
श्यामल मेघ यूं चन्दा को छुपायें
काली चूनर ओढ़ जैसे गोरी मुस्काये
चम् चम् तारे उसकी चूनर में पड़े हैं
जरी गोटा नगीने और सितारे जड़े हैं
पूनम का चाँद सितारों का साथ...
जैसे छम छम करती आई बारात
ये है पूर्णिमा की रात...ये है पूर्णिमा की रात..
-रोली पाठक.
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Sunday, March 7, 2010

नारी शक्ति की जय

चौदह साल से लंबित महिला आरक्षण बिल आज होगा संसद में पेश...
जिसका लाभ उठाएंगे ८०% वो पुरुष जिन्हें चुनाव लड़ने के किये पार्टी का
टिकिट नहीं मिलेगा, अपनी धर्मपत्नी को आरक्षित सीट पे चुनाव लडवा
के सत्ता की बागडोर अपने हाथ में रखेंगे और चुनाव जीत कर महिला
एक बार फिर चौका-चूल्हा संभालेगी! हाँ, हस्ताक्षर या अंगूठा उसका ही
होगा! इस बिल में एक प्रावधान और भी होना चाहिए की जो भी महिला
आरक्षित सीट की दावेदार हो उसकी पारिवारिक प्रष्ठभूमि अवश्य देखी जाये
कि उस परिवार से कोई पुरुष राजनीति में तो नहीं है! नगरीय निकाय चुनाव
में मैंने यह अनुभव किया कि महिला आरक्षण का लाभ भी पुरुषों को ही मिलता
है, उनके ना कोई निर्णय होते हैं ना कोई आवाज़.........!
हमें चाहिए आरक्षण के साथ उसकी स्वंत्रता, उसके स्वतंत्र निर्णय!
-रोली पाठक.
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Wednesday, March 3, 2010

माय नेम इज खान

आजकल संदेश देने वाली फिल्मो का दौर फिर शुरू
हुआ है! मै अपनी बेटी के साथ ये फिल्म
देखने गई थी, फिल्म के एक संवाद से वो काफी
प्रभावित हुई- " दुनिया में दो तऱ्ह के लोग होते
है- एक अच्छे,एक बुरे! हिंदू-मुसलमान व दूसरी
कौम ये सब बाते गलत है!" उसने अनेक प्रश्न
किये इस बात से जुडे हुये....जिनका धैर्यपूर्वक
उत्तर दिया मैने, लेकिन बाद में सोचा कि क्या
जैसा मैने उसे सिखाया वो मैने भी सीखा???
शायद नहीं.........!
सबसे झूट बोल सकते है हमलेकिन अपने मन से नहीं!
हम दोहरी जिंदगी जीते है....
समाज के लिये अलग और अपनी संतान के
लिये अलग! समाज के नियम, कानून-कायदे
अलग है जो कई जगह गलत भी है पर
हमे उन्हे मानना पडता है क्योंकी हम उसी
समाज का हिस्सा है, लेकिन हम अपने
बच्चो को सही बाते सिखाना चाहते है और
इसी सोच के चलते हम उनके सामने अपना
राम रूपी रूप प्रस्तुत करते है मन के रावण को
हम समाज के लिये रख लेते है, दशहरे को रावण
के दहन के बाद भी वर्ष भर हम कई बार इस
रावण को मारते है थो कभी उसे जिलाते है,जब
जैसी परिस्थिती हो हम उसी के अनुसार व्यवहार
करने लगते है! माय नेम इज खान का नायक
अंत तक नही बदलता, परीस्थितियो से समझौता
नही करता क्योंकी वो एक फिल्म का नायक है!
हमे तीन घंटे की फिल्म की नही वर्षो की जिंदगी
जीना है! हम फिल्म का संदेश ग्रहण करके अपनी संतान
को उपदेश दे सकते है परंतु अपने जीवन में उसे पूर्णतः
उतार नही सकते, जो संदेश फिल्म में है वो वर्षो से
हमारे मन का राम जानता है लेकिन रावण उसे दबा कर
रखता है, रावण का यही दमन राम को कमजोर करता है
क्योंकी तुलसीदास की रामायण में रावण का अंत एक बार
हुआ था, हम प्रतिवर्ष उसके पुतळे का दहन कर मान लेते है
कि रावण का अंत हो गया, लेकिन क्या वाकई रावण का अंत
हुआ है.........??? क्या अपने बेटी के प्रश्नो के सही उत्तर मेरे
पास है......???
एक पुराना गीत याद आ राहा है...........
"मोरा मन दर्पण कहलाये..
भले-बुरे सारे कर्मो को,
देखे और दिखाये........."
-रोली पाठक.
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Tuesday, March 2, 2010

होली शुभ हो....


फागुन की बयार, रंगों की फुहार
सरसों पीली, चूनर गीली..
अबीर-गुलाल
हरे,पीले,लाल..
राधा चली पनघट
किशन जमना तट
राधा को न भाएँ रंग ये हजार
एक बस श्याम रंग
उसे लुभाता है
लाल,हरे पीले रंग में
बस श्याम नज़र आता है....
आप सभी को होली की इन्द्रनुषी शुभकामनाएं....
-रोली पाठक.
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