उल्फत

जलवा-ए-हुस्न कुछ ऐसा है कि, हम पर शामत क्या कहिये.... पलकों की चिलमन गर उठें, लोगों की हालत क्या कहिये ..... आँखों में उल्फत के डोरे , उफ़,ज़िक्र-ए-कयामत क्या कहिये... छुप-छुप कर नज़रों का मिलना, हम पे ये इनायत क्या कहिये ...... बना कर तुझको वो खुद है हैरां , और इश्क-ए-इबादत क्या कहिये ..... कर लूं दुश्मनी खुदा से भी, अब और बगावत क्या कहिये.... - रोली