Friday, November 30, 2012

उल्फत


जलवा-ए-हुस्न कुछ ऐसा है कि,
हम पर शामत क्या कहिये....

पलकों की चिलमन गर उठें,
लोगों की हालत क्या कहिये .....

आँखों में उल्फत के डोरे ,
उफ़,ज़िक्र-ए-कयामत क्या कहिये...

छुप-छुप कर नज़रों का मिलना,
हम पे ये इनायत क्या कहिये ......

बना कर तुझको वो खुद है हैरां ,
और इश्क-ए-इबादत क्या कहिये .....

कर लूं दुश्मनी खुदा से भी,
अब और बगावत क्या कहिये....

- रोली 

5 comments:

  1. "कर लूँ दुश्मनी खुदा से भी
    अब और बगावत क्या कहिये"

    इससे बढ़कर और क्या होगा - लाजवाब

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया राकेश कौशिक जी....

      Delete
  2. वाह...
    बेहतरीन गज़ल....

    अनु

    ReplyDelete
    Replies
    1. अनु जी, बहुत-बहुत शुक्रिया....

      Delete