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सितम्बर की शाम..
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खामोश, स्तब्ध, चुप सी बिलकुल बेआवाज़.. न पत्तियों की सरसराहट न पंछियों की गुनगुनाहट न कोई सुगबुगाहट न हवा न गर्मी न सर्दी न बारिश न कोई मौसम नीरस बेजान सितम्बर की शाम... चुप आसमान चुप है ज़मीं शांत विचरते बादल अलसाये, घर लौटते थके थके खग दल पसरा हुआ सन्नाटा सब मायूस परेशान ग़मगीन खोयी खोयी सी सितम्बर की शाम.... - रोली
सुहाना सफर
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ट्रेन की खिड़की से बाहर, साथ-साथ भागते पेड़ और खेत देखना मुझे हमेशा अच्छा लगता है । सावन की रिमझिम बारिश का दौर जारी था, एक घंटे पूर्व ही बारिश थमी थी, तभी मै खिड़की का काँच खोल पायी । बाहर से आती ठंडी बयार और खेत की मिट्टी की खुश्बू ने मन में ताजगी भर दी । यूँ तो हमेशा ही मेरा रिज़र्वेशन एसी में रहता है लेकिन अचानक ही यात्रा निकल आने के कारण फर्स्ट क्लास में जाना पड़ा, सच तो यह है कि एसी के बंद दड़बेनुमा डब्बों में मै बेहद ऊब जाती हूँ । मै दिल्ली से लखनऊ जा रही थी । मुझे एक सेमीनार में अपने कॉलेज को रिप्रेजेंट करना था । पहले मेरी सीनियर मिसेज़ कौल जाने वाली थीं लेकिन अचानक एन वक्त पर उनकी तबियत खराब हो जाने के कारण मुझे जाना पड़ रहा है । मै लखनऊ पहली बार जा रही हूँ । नजाकत और नफासत की इस नगरी को देखने की उत्सुकता भी थी और सेमीनार की घबराहट भी । वहाँ ना जाने कितने अनुभवी और विद्वान अपने ज्ञान से अपने संस्थान का बखान करेंगे और मै महज तीन वर्ष की नौकरी के अधकचरे अनुभव को ले जाकर क्या करुँगी ! मुझे अपने प्रिंसिपल शर्मा जी पर झुंझलाहट हो आई । हालांकि मै कॉलेज के होशियार लेक्चरर्स...