Thursday, October 21, 2010

अधूरी दास्ताँ......

एक सदा थी, एक अदा थी

एक हया थी, एक वफ़ा थी

एक प्रेम का वादा था

एक मज़बूत इरादा था

एक सुहाना सपना था

एक अफसाना अपना था

एक राह भी थी, एक मंजिल भी...

दो कोमल प्यार भरे दिल भी...

एक तरफ सारा संसार

एक तरफ था मेरा प्यार

फिर, वही हुआ जो जग की रीत...

जग जीता, और हारी प्रीत...

बिछड़ गया मेरा मनमीत...

बिछड़ गया मेरा मनमीत...

-रोली पाठक

14 comments:

  1. वाह ! क्या खूब लिखा है
    सुन्दर एहसास सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई के पात्र है

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  3. बहुत ही सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  4. bhavpoorna rachana .........shabda shabda dil me utar gaya ...........ek achchhi rachana ke liye dhanyavaad

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  5. वर्मा जी, सुनील जी, वंदना जी, संजय भास्कर जी, नवीन भाईसाहब....आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद....

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  6. वाह अच्छी रचना इस कविता के माध्यम से तो आप जीत गयी !

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  7. अमरजीत जी...शुक्रिया...आपके तो नाम में ही जीत है :)

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  8. सुन्‍दर कवितायें लिखती हैं आप, धन्‍यवाद.

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  9. दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाये !कभी यहाँ भी पधारे ...कहना तो पड़ेगा ................

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  10. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है,
    जूझने के लिए है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामनाये!!
    दीप उत्सव की बधाई...................

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  11. Shabdo ko ek taar me pirona koi aapse sikhe.....

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  12. संजीव जी, अमरजीत जी, दीपेश.....आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.........

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  13. ye dard...........ye ahsas..........door hokar bhi aap.....lag rahee bahut paas....bahut2 acha likhti hain aap.....thanks.

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