Thursday, December 2, 2010

परिंदे..............


कितना सूना-सूना सा, ये जहाँ दिखता है...

खो गए सारे परिंदे,

अब तो बस मुट्ठी भर आसमाँ दिखता है....



ईंट-पत्थर से, बन गए ऊँचे-ऊँचे घरौंदे,

अब तो बस झरोखे और मकाँ दिखता है.....



ढूंढता हूँ परिंदों को, छत औ चौबारों में,

अब ना कहीं उनका, नामो-निशाँ दिखता है....



तिनकों को कचरा कह, फेंक देता है इन्सां,

जहाँ उसको, इनका आशियाँ दिखता है......



कहाँ जाये, कहाँ......रहें ये परिंदे,

कि हर तरफ इमारतें और इन्सां दिखता है.....



खो गया इनका कलरव, खो गई चहचहाहट,

अब तो बस मशीनों का,धुंआ दिखता है.....



-रोली पाठक

19 comments:

  1. आज बड़ी बडू इमारतों के बन जाने से ऐसा ही दिखता है ..खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  2. बहुत सुन्दर ! रोली , तुम्हारी कविताओं में एक प्रवाह होता है जो चित्र से उठकर शब्दों में घुलता है और उसकी मिठास या अहसास पाठक के मन में मिसरी सी घुल जाती है ... ये शब्द तुम्हारे स्वाभाव की प्रतीति कराते हैं .
    स्नेह सहित

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  3. यह बिलकुल सच है की मशीनी युग में प्रकृति की सुंदरता के प्रतिक यह परिंदे और इनकी कलरव न जाने कहा खो गई हे ,जहा देखो वहा सिर्फ और सिर्फ दोडता हुआ मानव ही दिखाई देता है .. आसमा को छूती हुई इमारतों के बीच इनकी परछाई भी नज़र नहीं आती है .......

    .आपका ब्लॉग बहुत सुंदर है ,बहुत अच्छा पड़ने को मिला काफी देर तक विचरण किया यहाँ .प्रत्येक रचना में गुंथे हुए शब्द के फूल आपके स्वभाव की खुशबु बिखरा रहे है ....बधाई

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  4. भावों को खूब बुना है और सच को भी उजागर किया है……………एक बेहद उम्दा और शानदार प्रस्तुति दिल को छू गयी………………बधाई।

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  5. संगीता जी....अपर्णा दी....
    आप जैसी उच्च कोटि की लेखिकाओं की कलम से प्रशंसा सुन कर मन प्रसन्न हो जाता है, ह्रदय से आभार.

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  6. प्रवेश जी,
    मुझे बहुत अच्छा लगा यह जान के कि आपने
    मेरे ब्लॉग की समस्त रचनाएं पढ़ीं...
    बहुत-बहुत आभारी हूँ...धन्यवाद :)

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  7. वंदना जी...ह्रदय से धन्यवाद.... :)

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  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010
    को छपी है ....
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

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  9. संगीता जी...बहुत-बहुत धन्यवाद...

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  10. आपकी कविता में परिंदों की चिंता तो है ही ,पर्यावरण के प्रति भी आपकी चिंता साफ झलकती है .आपकी सोंच और कविता लिखे जाने में किया गया श्रम दोनों सराहनीय है

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  11. pratibaddh soch prashansniya hai!
    sundar rachna!

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  12. परिन्दों की कश्मकश ..

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  13. ​​खो गया इनका कलरव, खो गई चहचहाहट​
    ​अब तो बस मशीनों का धुआं दिखता है।​
    ​पहली बार आपके ब्लाग पर आना हुआ। बेहद अच्छा लगा। मन संवेदनशील होता है तो अपने से इतर समाज दिखता है और कविता जनमती है। आभार स्वीकारें, आगे बढ़ें।

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  14. महानगरों में कहाँ दिखाई देते हैं आज पक्षी..पक्षी और इंसान के अस्तित्व की लड़ाई में पक्षी आज परविहीन होगये हैं . बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति ..

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  15. रोली जी,
    नमस्कारम्‌!

    मैं जितेन्द्र ‘जौहर’.... पूरे होशो-हवास में यह हलफ़ बयान करता हूँ कि मुझे आपकी ‘परिन्दे’ रचना पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई। कारण कि आपकी संवेदना की व्यापक परिधि में पक्षी भी शामिल हैं...ऐसे में मुझे लगता है कि आप इंसान का दुःख-दर्द देखकर/महसूस कर द्रवित हो उठती होंगी...इस सुन्दर भावपूर्ण रचना के लिए बधाई...!

    एक अनुरोध यह कि यदि आप ग़ज़ल में शिल्पगत जानकारी हासिल करने की कोशिश करें, तो आप और भी बेहतर एवं प्रभावपूर्ण सृजन कर सकेंगी।

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  16. अच्छी सुंदर रचना
    इस बार मेरे ब्लॉग में SMS की दुनिया

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  17. कुंवर कुसुमेश जी, आपकी इस टिप्पणी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद....

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  18. अनुपमा जी, वर्मा जी, कैलाश जी, अमरजीत जी....इस सराहना के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद...

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  19. जीतेन्द्र जौहर जी, नमस्कार....आपकी टिप्पणी से उत्साहवर्धन हुआ...आपके कहे अनुसार अवश्य प्रयास करुँगी |

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