Saturday, August 27, 2011

ना लो सब्रे-इम्तेहान अवाम का,
गर चिंगारी शोला बन गयी तो,
संभाल ना पाओगे...........
क्यों कर हवा दे रहे हो इसे,
इस आग में खुद ही जल जाओगे....
लटक रहा दारो-रसन अब तुम्हारे ऊपर,
कब तक इससे खुद को बचा पाओगे....
देख  लो  अवामे-ज़ारहिय्यत,
चले जाओ कि,
खानखाह में ही अब तुम बच पाओगे.......

(  दारो-रसन : सूली व् फाँसी की रस्सी,
ज़ारहिय्यत : गुस्सा ,
खानखाह : वे गुफाएं जहाँ ईश्वर की इबादत में समय बिताया जाता है )

-रोली.... 

 

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना, सार्थक और खूबसूरत प्रस्तुति .

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  2. शुक्ला जी, धन्यवाद...

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