बेदर्द ज़माना


 इस ज़माने में दर्द बहुत है 
आइना-ए-ईमान में गर्द बहुत है,

कई  दफा दिखी दम तोड़ती इंसानियत,
जज़्बात-ए-इन्सां अब सर्द बहुत है....

वक़्त बुरा हो, तब हाथ बढ़ाता नहीं कोई,
कहने को तो यूँ यहाँ, हमदर्द बहुत हैं....

मजलूम पर और भी, ढाती है ज़ुल्म दुनिया ,
जाने क्यों  इन्सां यहाँ ,  बेदर्द बहुत हैं....


-रोली...

Comments

  1. बहुत खूब ... अच्छी प्रस्तुति

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  2. वाह ...बहुत खूब

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  3. Waah....Bahut Khoob...:)))

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  4. jajbate insa sard bahut h.
    sahne ko yaha marj bahut h.
    dikhte nahi mard yaha.
    dikhne ko aaj na mard bahut h.
    sultan singh jasrasar

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