Saturday, April 7, 2012

एक मासूम से सपने को आज जलते देखा
उसके हर इक अरमान को पिघलते देखा
कभी मुट्ठी में चाँद-सितारे रखा करती थी वो,
आज उसे खुले आसमान तले पलते देखा
जानती थी मै ये दुनिया बड़ी ही संगदिल है,
इस बार तो हरेक रिश्ते को बदलते देखा
कहते हैं तेरे दर पे सिर्फ देर है, अंधेर नहीं
फिर क्यों अपनों को ही उसे, निगलते देखा........

-रोली

3 comments:

  1. बहुत समर्थ सृजन, बधाई.

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  2. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    ....... रचना के लिए बधाई स्वीकारें....!!!

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    1. Shukla ji, Sanjay Bhaskar ji.....
      Bahut-bahut dhanywaad......

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