Monday, May 14, 2012

ह्रदय से उठती कसक,
सफ़र तय करके पहुँची,
जिस्म से रूह तक,
यादें बन गयीं आँसू
आते-आते नैनो तक.....
क्या इस खारे पानी में
सिमट कर तुम बह जाओगे !!!
या और भी भीतर समा जाओगे,
मेरे अंतर्मन तक................!
चाहूँ बस जाना तुम्हारे
जिस्म के हरेक कतरे में,
जीवनदायिनी हर साँस में,
हर धड़कन में हर प्यास में,
हर कसमो में हर वादों में,
तुम्हारे मजबूत इरादों में.........................
तब तो रुक जाओगे न तुम !!!
फिर कहीं न जाओगे तुम.........!
रोक लूंगी,समेट लूंगी, 
अब ये आँसू नैनो में.....
ना बहने दूँगी  मै,
इन स्वर्णिम यादों को......
प्रिय, तुम्हारी यादों को .....

-रोली.





2 comments:

  1. Vandana जी...धन्यवाद.....कभी-कभी दर्द अंतर्मन से महसूस होता है।...

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