कभी उछलती कभी फुदकती गेंद की तरह कभी मचलती कभी संभलती लहर की तरह कभी मीलों अकेली है साहिल की तरह कभी शोर में डूबी हुयी मेले की तरह कभी ग़मगीन कभी परेशान इंसान की तरह कभी मासूम कभी नादान बच्चे की तरह एक रूप नहीं है इसका बहुरूपिया है यह "ज़िन्दगी" नाम है इसका जीना है किसी तरह........................... -रोली....
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सोचती थी समय गया,वयस गयी, अब वो भावनाएं शायद ना रहीं वो चाँद में तुम्हारा नज़र आना, वो अक्सर उपहारों का नज़राना, बीतते वक़्त ने धुंधला दिया था सब कुछ हमने भुला दिया था ... किन्तु हो रहा महसूस अब यह, है सबकुछ वही बस नाम नए, प्रेम अब त्याग और समर्पण है हमारे ह्रदय एक-दूजे का दर्पण हैं चाँद उन बच्चों की लोरी में है जो तुमने दिए उपहार में...... है सबकुछ वही, बस नाम नए.. बस नाम नए......................... -रोली