Friday, June 1, 2012

सोचती थी समय गया,वयस गयी,
अब वो भावनाएं शायद ना रहीं
वो चाँद में तुम्हारा नज़र आना,
वो अक्सर उपहारों का नज़राना,
बीतते वक़्त ने धुंधला दिया था
सब कुछ हमने भुला दिया था ...
किन्तु हो रहा महसूस अब यह,
है सबकुछ वही बस नाम नए,
प्रेम अब त्याग और समर्पण है
हमारे ह्रदय एक-दूजे का दर्पण हैं
चाँद उन बच्चों की लोरी में है
जो तुमने दिए उपहार में......
है सबकुछ वही, बस नाम नए..
बस नाम नए.........................
-रोली

1 comment:

  1. है सबकुछ वही, बस नाम नए.बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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