संघर्ष
क्वांर का महीना आ गया । हल्कू रोटी का गस्सा तोड़ते-तोड़ते सोच रहा था । बोअनी सर पर है, आधा एकड़ कुल जमीन में इस बार आधे में गेंहू और आधे में चना और सरसों लगा दूंगा । लेकिन बीज, खाद के लिए रुपये कहाँ से आयेंगे ! "रोटी लोगे जी?" लछमी बोली । "ना, हो गया , बस । " "हओ" कहते हुए उसने खाना ढांक कर किनारे रख दिया । खाना खा कर हल्कू बाहर आ गया, खीसे से बीड़ी निकाली, माचिस से सुलगाई और फिर विचारमग्न हो गया । लछमी भी आ कर वहीँ बैठ गयी । "बोअनी की चिंता कर रहे हो ना ! कछु ना सोचो, सब ठीक हो जैहे । मेरी पायरें गिरवी रख दइयो । दो हजार तो मिल ही जेहें । " "ह्म्म्म , ट्रेक्टर भी किराये से लानो है, फिर बीज और खाद । सिंचाई के लिए बामन के खेत से पानी के लिए बाहे भी रुपैया देनो पड़ेंगे " "अरे, सब हो जेहे ।" लछमी विश्वास से बोली । "सात-आठ हजार का खर्चा है , बल्कि दस पकड़ लो " "इतना.......?" लछमी की आँखें चौड़ी हो गयीं । "हओ" ... चाँद डूब रहा था । लछमी तीन वर्ष के बेटे शंकर को लिपटाये सो रही थी । हल्कू ने...