Monday, April 12, 2010

मध्यम वर्ग का कीड़ा


मुट्ठी में फडफडाते नोट
देख कर
डूबा हुआ है वो
यह सोच कर..
क्यूँ ना हूँ मै
इतना गरीब
कि फटेहाल भी
रह सकता
रोटी-प्याज भी
खा कर
जी सकता..
ना होते पडोसी
ना रिश्तेदार
ना किसी के सवाल
ना जवाब...
फक्कडपन से रहता
रोज़ कुआं खोद के
पानी पीता...
फटे कपडे पहन कर
शान से घूमता...
फिर ख्याल आया उसे....
या तो होता इतना अमीर
कि इन मुट्ठी में बंद
रुपयों को
भीख में दे सकता...
ना पेट की होती चिंता
ना अपनों की फिकर
दीवार पर चिपके होते
नोट वॉल-पेपर पर...
खाने की थाली
सोने की होती
जिसमे भोजन होता
रत्न, जवाहर, माणिक का...
लेकिन मै हूँ एक कीड़ा
समाज के ऐसे वर्ग का
जहाँ
इतने से रुपयों में ही
पेट की आग, तन की सज्जा...
माँ की दवाई, पत्नी की लज्जा..
बेटे की कोचिंग
बेटी की पढाई
बनिए का राशन
दूध का बिल और
मकान की इ.एम्.आई.
सब का करना होगा हिसाब
ये मुट्ठी भर नोट
किस-किस काम आएंगे...!!!
क्यूँ पैदा हुआ मै..
इस मध्यम वर्ग में
जहाँ इन मुट्ठी भर नोट में ही
मर मर के जीना होगा...
और ज़िन्दगी भर
कर्ज़दार बन कर
रहना होगा...

5 comments:

  1. Ek yathartha parak kavita---aj ke naukareepesha adamee kee majabooriyon ko bahut sundar dhang se vyakhyayit kiya hai apane.

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  2. "मध्यम वर्ग जो कि अक्सर-अवसरवादी होता है-का सजीव चित्रण किया है आपने !शायद परिस्थति ही मनुष्य को वर्गों में बाँट देती है..पर जो भी हो फिलहाल यह कविता पढ़ते-पढ़ते मन रोज़ कुँआ खोदकर पानी पीने का कर रहा है..... और राम झूले का बहुत सुन्दर चित्र है,एकदम सजीव लगता है कि अब गिरे कि तब...पर ऐसा होता नहीं है...."

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  3. धन्यवाद पूनम जी व प्रणव जी,
    आप लोगों के शब्द उत्साहवर्धन करते हैं...

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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  5. प्रशंसा के लिए धन्यवाद संजय जी..

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