गर्मी की छुट्टियां


(मेरे बच्चे चाहते थे उनके लिए कोई कविता लिखूं, तो अपने बचपन को याद करके कुछ लिखा है, बचकाना सा... )

बैठे-बैठे सोच रही हूँ
अपने बच्चों को देख रही हूँ
नज़र गडाए टी.वी. पर जो,
टॉम एंड जेरी देख रहे हैं...
कितना नीरस इनका बचपन,
सोच रही हूँ मै मन-ही-मन
कहाँ खो गए खेल वो प्यारे,
खेले थे मिल हमने सारे,
पिंकी-पिंकी व्हाट कलर और
पोशम्पा भई पोशम्पा...
लुकाछिपी और नदी-पहाड़,
और कभी सितौलिया....
घर में पाँव ना टिकते थे
बाहर भागे फिरते थे,
खेलकूद के हो बेहाल जब,
घर को वापस आते थे,
पूड़ी-सब्जी आम की लौंजी,
मिल बाँट कर खाते थे...
लस्सी, पना और गन्ने का रस,
रस लेले कर पीते थे...
तब ना थे ये थम्स-अप, फैंटा...
फ्रूटी, स्प्राईट औ लिम्का....
पढ़ते थे हम चम्पक-नंदन,
भरता ना था उनसे ये मन..
चाचा चौधरी और चंदामामा
जुपिटर के साबू का कारनामा..
पराग और अमर चित्र कथाएं...
अब भी देतीं मुझे सदायें....
कितना प्यारा था वो बचपन
नानी के घर का वो आँगन..
बटलोई में डाल उबलती..
चूल्हे पर रोटी थी सिंकती...
हर गर्मी में जाते थे हम,
मन भर के रह आते थे हम..
बदला अब बच्चों का बचपन
टी.वी. कंप्यूटर इनका जीवन
जिस दिन सर्वर डाउन रहता,
विचलित रहता इनका भी मन...
पानी की तरह पेस्ट्रीसाईट पीते,
नूडल्स-पिज्जा, बर्गर पर जीते..
दूध-दही से दूर ये भागें,
दिन में सोयें रात में जागे,
हाय रे कैसा इनका बचपन,
सोच रही हूँ मै मन -ही-मन.............
-रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

Comments

  1. रोली जी . बहुत सुन्दर लिखा । मुझे अपना बचपन याद आ गया ।

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  2. बहुत अच्छी कविता।

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  3. कमाल है हरगिज़ ये बचकाना-सा नहीं है बल्कि बेहतरीन कविता है लयबद्ध तुक सहित जो कि अच्छी लगती है और सामग्री भी कमाल की जुटाई है । इसीलिये अभी भी हमारे पास नानी, पराग और अमर चित्र कथा सहेज कर रखी हुईं हैं ताकि बचपन को याद कर सकें कभी-कभी....बहुत अच्छी कविता..."

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  4. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  5. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  6. आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद...मनोज जी, अरुणेश जी, प्रणव जी, संजय जी....ये मेरी बचपन की गर्मी की छुट्टियां थीं :)

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  7. Ek dam sahi baat, Isliye hi mai apne 2 saal ke bhatije ko roj shaam kahin na kahi ghumane le kar jata hun jahan use khula chod deta hun taki wo khul kar kuch pal hi sahi jee le. Wo jab hasta hai kilkariya maarta hai. mai bhool jata hun ki kab raat ghir ai hai. mere bachpan ke din wo mera gaon. sab kamaal ka tha. its a nice thought. original one.

    Amit K Tyagi at great, kabhi kabhi achanak koi pathar apse hat jata hai aur niche se kuch chamkte moti nikal padte hai.. kuch aisa hi hua, maine next Blong per click kiya aur apka blog nikal aaya. kuch khaas baat hai...

    Amit K Tyagi at http://yezindagihain.blogspot.com/

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  8. Bahut hee sunder likha hai. Sach mano, kavita pad kar apna bachpan yaad aa gya.
    Hum raat ko dadi/nani se kahanya bhee suna karte thye.
    Sach hee aaj Computer/T.V. ne sabh badal dala hai. Bache khelne-kudna bhool gaye hain.

    Hardeep

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  9. अमित जी...आप अच्छा करते हैं जो अपने भतीजे को खुले मैदान में ले जाते हैं...वो अपना बचपन यूँ ही याद रखेगा...

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  10. हरदीप जी, सच कहा आपने...जब बच्चे जिद करते हैं तब मै अपनी नानी व दादा-दादी से सुनी कहानिया ही सुनाती हूँ उन्हें, वे आज भी याद हैं मुझे...

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  11. Great Work....the best so far....
    keep it up

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  12. अपना बचपन याद आ गया । अच्छी कविता...

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  13. roli ji aapne to mere bachpan ki yaad ese likh di jaise koi samne hoti ghatanaye dekh raha ho.kanha vo bachapan hum inhe bilkul nahi de payenge .un dino PRAG, champak, manmohan,Nandan ka alag hi standerd thaa HUUM besabri se intjaar karte the, nani ke ghar bitaye din jindgi bhar yaad rahte hain.

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    1. भारद्वाज जी ,
      बहुत-बहुत धन्यवाद | आजकल के बच्चों के जीवन में और 30 पूर्व के जीवन में एक युग का अंतर है | हमने जो आनंद उठाया है वो इनके लिए किताबी बातें या कहानी-किस्से बन कर रह जायेंगे | ये नहीं जानते, ये लोग क्या मिस कर रहे हैं |

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