Sunday, June 27, 2010

स्वप्न...



मन की वीणा के तार बजे
अधरों पे मेरे गीत सजे
नयनों ने नींदों से मिल कर,
अभिराम मनोहर स्वप्न रचे...
कुछ पीड़ा थी कुछ प्रीति थी
कुछ मेरी आप-बीती थी
ये अँखियाँ रीती-रीती थीं
उन रीती अंखियों में भरकर,
नयनों ने नींदों से मिलकर,
अभिराम मनोहर स्वप्न रचे
इन सपनो में कुछ अपने थे
इन अपनों से कुछ शिकवे थे
नयनों के सपनो ने शिकवों को,
आंसू में बदल कर बहा दिया...
इस बहती अश्रुधारा ने,
मुझे मीठी नींद से जगा दिया
वो सुन्दर सपने छूट गए,
वीणा के तार टूट गए और
गीत अधर के रूठ गए...
उड़ गयी वो निंदिया मीठी सी..
रह गयीं ये अँखियाँ रीती से...रीती सी....
-रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

7 comments:

  1. Roli pathak ji, Aapne jo poem likhi hai " Ankhian reeti-reeti si hai" Bahut hi khubsurat langi, isamai shabadhon ko jis prakar gada gaya hai, Lagata hai jaise motion ki maala banai gaye hai.

    ReplyDelete
  2. virah ke sukomal bhaavon se snaat kavita ke liye sadhuwad! isi trah likhti raho.
    sneh sahit didi

    ReplyDelete
  3. ek party me aapse yun udti hui si mulakat hui...pr tab zara bhi andaz nahi tha...ki mae ek behtareen kalamkar se mukhatib hun..kya khoob likhti hain.....shifalee

    ReplyDelete
  4. "बेहतरीन...लगभग विशुद्ध हिन्दी की कविता....मनोभावों को बहुत अच्छे से उकेरा है ......."

    ReplyDelete
  5. AAp ki dil ki AAWAAZ achhi lagi. Bahut sunder likhaa hai aapne.

    ReplyDelete
  6. Wow....In sapno mein kuchh apne the...Aansoo mein badal kar baha diya...ati sundar..

    Anil

    ReplyDelete
  7. अपर्णा दी, अशोक जी, प्रणव जी, शेफाली जी, वीरेंद्र जी, अनिल जी आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद...

    ReplyDelete