Wednesday, June 30, 2010

बेबसी.........


इच्छाएं अनंत
मन स्वतंत्र
जीवन परतंत्र......
दायित्व अपार
असहनीय भार
कैसे हों,स्वप्न साकार.....!!!
दमित मन
ह्रदयहीन तन
विचलित जीवन.......
ह्रदय की पीर
नयनों के नीर
तन, बिन चीर.......
अन्न, न जल
भूख से विहल
दरिद्र नौनिहाल............
माँ की बेबसी
तन को बेचती
रोटी खरीदती..............
ह्रदय पाषाण
व्यथित इंसान
हे देश, फिर भी तू महान..........!!!

-रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

7 comments:

  1. एक सच्चे, ईमानदार कवि के मनोभावों का वर्णन। बधाई।

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  2. बहुत उम्दा रचना!

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  3. मनोज जी, समीर जी, मृदुला जी...शुक्रिया...

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  4. "यह भी एक सच्चाई है एक कड़्वी सच्चाई जो कि इस कविता में परिलक्षित हुआ है....हर लाईन अपने में मुकम्मल है...बहुत बढ़िया..."

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  5. बहुत बढ़िया रचना...!!

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  6. @ रोली.. अविच्छिन्न एक-मन का विच्छेद शब्दों द्वारा..जीवन व्यथा मानसिक उथल-पुथल का रूप ले ह्रदय को उद्वेलित कर गयी.. :)

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