शीशमहल ...

इक आशियाना हो काँच का..... जहाँ कमरे की छत से धूप आये बरसात में बूंदे बरस-बरस जाएँ सर्दियों का कोहरा रूह तक महसूस हो गर्मी की लू , बदन थरथराए.... बस एक ऐसा आशियाना हो काँच का............................ लेटूँ रात में बिस्तर पे जब अपने वहीं से बादलों में चाँद नज़र आये काँच की दीवारों से भोर होते ही सूरज की किरणें जगमगाएं .... बस एक ऐसा आशियाना हो काँच का............................ कमरे से जुगनुओं को चमकते देखूँ गिलहरी को पेड़ पर चढ़ते देखूँ फूलों पर तितली और भँवरे मंडराएं महसूस हों जहाँ ये, हर पल दायें-बाएं हाँ, इक ऐसा आशियाना हो काँच का.............................. - रोली