Saturday, October 13, 2012

शीशमहल ...


इक आशियाना हो काँच का.....
जहाँ कमरे की छत से धूप आये
बरसात में बूंदे बरस-बरस जाएँ
सर्दियों का कोहरा रूह तक महसूस हो
गर्मी की लू  , बदन थरथराए....
बस एक ऐसा आशियाना हो
काँच का............................

लेटूँ रात में बिस्तर पे जब अपने
वहीं से बादलों में चाँद नज़र आये
काँच की दीवारों से भोर होते ही
सूरज की किरणें जगमगाएं ....
बस एक ऐसा आशियाना हो 
काँच का............................

कमरे से जुगनुओं को चमकते देखूँ
गिलहरी को पेड़ पर चढ़ते देखूँ 
फूलों पर तितली और भँवरे मंडराएं 
महसूस हों जहाँ ये, हर पल दायें-बाएं 
हाँ, इक ऐसा आशियाना हो  
काँच का..............................

- रोली 

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर मोहक परिकल्पना ..

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    1. धन्यवाद कविता जी |
      ब्लॉग पर पधारने के लिए धन्यवाद |

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  2. ऐसा ही हो सपनो शीश महल ....
    बहुत ही सुन्दर कल्पना को आकार दिया ... शरद पूर्णिमा की बधाई !!!

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  3. Baap rey-Aap kaun ho
    abhi bahi mulkat huee hai
    Behan key naam sey jaanta huu
    per tak kalakar ko pehchna nahi tha

    Apna asli parichay karane ka shukrya DI

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