Wednesday, October 10, 2012

सफर..


मेरी मुतमुईनी को ज़माने ने बेफिक्री समझा
कोई ना समझा ख्वाहिशों की तिश्नगी मेरी

मीलों जो चलता जा रहा यह रास्ता लंबा
इस स्याह सड़क की ही  तरह है जिंदगी मेरी

कहीं उखड़ी कहीं कच्ची कहीं टूटी हुई सी है
अकेले दूर तक चुपचाप चलती जिंदगी मेरी

रंग इसका स्याह मेरी तकदीर सा ही  है
कदमो  तले  दबती  हुई सी जिंदगी मेरी

पहुँचाती मुसाफिरों को ये उनकी मंजिलों तक
और खुद भटकती रहती है ये जिंदगी मेरी .....

- रोली

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