Friday, July 29, 2011

हर अहसास को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती,
गर  होती न मोहब्बत तो ज़िन्दगी,
इतनी खूबसूरत नहीं होती.....

आँखें बंद करके देखा है जब-जब  तुम्हें,
 नींदों में  ख़्वाबों  की भी, ज़रूरत नहीं होती....

मिलकर भी दूर बैठे हो, क्यों ऐसी बेरुखी,
यूँ दूरियाँ भी तो कोई , शराफत नहीं होती....

ज़माने का है उसूल, मोहब्बत को रोकना,
तेरे लिए जो लड़ लूँ, वो बगावत नहीं होती..
हर अहसास को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती...

-रोली...

9 comments:

  1. हर एहसास को लफ़्ज़ों की जरूरत नहीं होती ,
    गर होती न मोहब्बत तो जिन्दगी ,
    इतनी खूबसूरत नहीं होती ....

    बहुत खूब, दो पंक्तियों में सारी जिन्दगी का सार, आभार

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  2. बहुत बढ़िया रोली जी।

    सादर

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  3. खुबसूरत एहसासों से रची रचना....

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  4. ज़माने का है उसूल, मोहब्बत को रोकना,
    तेरे लिए जो लड़ लूँ, वो बगावत नहीं होती..
    हर अहसास को लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं होती...

    खूबसूरत एहसास से रची सुन्दर रचना

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  5. "हर एहसास को लफ़्ज़ों की जरूरत नहीं होती"

    बहुत खूब

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  6. यशवंत जी, सुषमा जी, सागर जी, राकेश जी, संगीता जी, शुक्ला जी.....
    आप सभी को हार्दिक धन्यवाद..

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  7. ahsas ko lafjon ki jaroorat nahee hoti,

    so nice feeling..thanks Roliji.

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