Wednesday, February 24, 2010

सलोना...

बंदूकें गुड़िया गुड्डे मोटर
उछल-उछल के नाचता बन्दर
टूटे फूटे खिलौनों को
कचरा समझ खिलौनों को
भर कर एक झोले में
कामवाली बाई के सलोनो को
दे कर खुश है माँ और छोटा बेटा,
माँ घर की सफाई से
बेटा नए खिलौनों के वादे से
बाई भी खुश है अपने सलोने की मुस्कान सोच कर...
रात को बेटा खेल रहा है
लिओ टौयेस और फन स्कूल से
माँ नए रंगीन महंगे खिलौनों को
सजा रही है कमरे में
उधर बाई के घर में भी
गूँज रही है किलकारी
टूटी हुई गुडिया भी लग रही है
उसे सबसे प्यारी
बन्दर की एक आँख नहीं है
मोटर है जो चलती नहीं
बन्दूक जो बस बन्दूक ही है
इन टूटे फूटे खिलौनों को सजा रहा है सलोना
किसी के घर के कचरे से
महक रहा है इस घर का कोना कोना........

5 comments:

  1. ये कविता मैंने तब लिखी थी जब मै
    ११ वीं कक्षा में पढ़ती थी...कुछ शब्द
    इधर-उधर अवश्य किये हैं.........

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  2. This is good... Keep it up......

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  3. कल 07/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर भाव.... सार्थक रचना

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  5. बहुत बढि़या ।

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