Wednesday, July 21, 2010

प्रीति.....


आसमाँ के अश्क
धरती पी रही है
सूरज के दिए ज़ख्मो को,
बूंदों से सी रही है......
जेठ की अगन
झुलसा चुकी तन
आ गया सावन
वो अमृत घूँट पी रही है....
धूप से पड़ीं
उसके तन पे दरारें
सुनके आसमाँ ने,
वसुधा की कराहें
बरसा दीं तड़प के
अपनी प्रेम फुहारें..
अश्कों की बूंदों का अब वो,
मरहम लगा रही है..
सूरज के दिए ज़ख्मो को
बूंदों से सी रही है.......
आसमाँ के अश्क
धरती पी रही है.........

-रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर .. समसामयिक भी

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  2. "बूँदों की तरह लयबद्ध...."

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  3. बेहद ही सुन्दर भावों और बिम्बों से सजी एक मुकम्मल रचना के लिए बधाई. !!

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  4. प्रकृति के प्रतिबिम्वोँ को अच्छे से सहेजा हैँ। बधाई

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  5. मेरे सभी प्रिय एवं आदरणीय मित्रों का ह्रदय से आभार...

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