बेबसी

कैसी है उलझन जो सुलझती नहीं गांठे रिश्तों की अब खुलती नहीं ............ चाहूँ सीधे रास्तों पे सफर तय करना इस तरह मंजिल मगर मिलती नहीं ........ गीत तो कई सजे हुए हैं मेरे अधरों पर , क्या करूँ कि मन वीणा अब बजती नहीं ...... निर्झरिणी सा बहे जा रहा मेरा ये मन , काया है वहीँ जहाँ खुशियाँ मुझे मिलती नहीं ........... रहना होगा जंजीर से जकड़ी हुई इस देह को, पीड़ा रिश्तों की मगर, देख सकती नहीं..... चाहूँ मै, कि तोड़ दूँ ये सारे मिथ्या बंधन , किन्तु नारी हूँ...पाषाण मै बन सकती नहीं.......... - रोली