Thursday, January 31, 2013

बेबसी


कैसी है उलझन जो सुलझती नहीं
गांठे रिश्तों की अब खुलती नहीं ............
चाहूँ सीधे रास्तों पे सफर तय करना
इस तरह मंजिल मगर मिलती नहीं ........

गीत तो कई सजे हुए हैं मेरे अधरों पर ,
क्या करूँ कि मन वीणा अब बजती नहीं ......
निर्झरिणी सा बहे जा रहा मेरा ये मन ,
काया है वहीँ जहाँ खुशियाँ मुझे मिलती नहीं ...........

रहना होगा जंजीर से जकड़ी हुई इस देह को,
पीड़ा रिश्तों की मगर, देख सकती नहीं.....
चाहूँ मै, कि तोड़ दूँ ये सारे मिथ्या बंधन ,
किन्तु नारी हूँ...पाषाण मै बन सकती नहीं..........

- रोली

8 comments:

  1. मन के मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद सुषमा "आहुति" जी....

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  2. उफ़ नारी मन के भावों को सटीक उकेरा है

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    1. वंदना जी....आभार | इन भावों को समझने के लिए..आपका हार्दिक धन्यवाद |

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  3. मर्म स्पर्शी रचना


    सादर

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    1. यशवंत माथुर जी..... शुक्रिया |

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  4. "नारी हूं पाषाण बन सकती नहीं" - शास्वत सत्य

    मार्मिक प्रस्त्तुति

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    1. राकेश कौशिक जी... हार्दिक धन्यवाद |

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