Thursday, April 4, 2013


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दोहराए वक्त ने फिर वही फ़साने
जिन्हें बामुश्किल भुलाने लगे थे...
बुझती नहीं ये तिश्नगी-ए-उल्फत
उबरने में जिससे ज़माने लगे थे...

- रोली
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4 comments:

  1. वाह रोली जी वाह इन शानदार पंक्तियों पर ढेरों दाद कुबूल करें.

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    1. शुक्रिया अरुण शर्मा जी :)

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  2. दर्द का एहसास कराती रचना-रोली जी वाह!
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