Monday, June 1, 2015

दस्तूर-ए-ज़माना

वो अल्फ़ाज़ बनके कागज़ पे
आहिस्ता से दिल में उतरना..
किताब के बीच रखे अचानक
किसी पुराने ख़त का मिलना..
एक-एक लफ्ज़ में किसी की
लावा-ए-उल्फ़त का ढलना..
इकरार हो या इनकार हरेक
याद को सहेज-सहेज के रखना..
अब न वो बातें, न वो ख़त रहे
न रहीं सँभाली हुई कतरनें..
न अब मिलते हैं सूखे गुलाब
यादों संग कहीं पन्नों में दबे हुए..
नए ज़माने ने बदले दस्तूर पुराने
फ्लोरिस्ट दे जाता है फूल लुभावने..
अब भेजिए इज़हार-ए- मोहब्बत
जो हुई क़ुबूल तो सिलसिला चलेगा
वर्ना बस "डिलीट मेसेज" का बटन दबेगा ।
एक ही तो नहीं जिसके लिए,
अब ताउम्र कोई इंतज़ार करेगा..
तू नहीं और सही ये सिलसिला चलता रहेगा ।
- रोली

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