Monday, March 8, 2010

चन्दा की डोली



हर रात की अजब कहानी है
कभी अमावस कभी है पूर्णिमा..
हर रात चन्द्रमा की नयी है भंगिमा
पूनम का चाँद लगे एक गहना
नाज़ुक सी कलाई में मानो
कंकण हो पहना
बिखरे हैं तारे जैसे गोरी की चूनर
चन्दा लगे जैसे माथे पे झूमर
बादलों से लुक-छिप जैसे गोरी शर्माए
घुंघटा उठाये और उठा के गिराए
पिया संग जैसे करे अठखेलियाँ
श्यामल मेघ यूं चन्दा को छुपायें
काली चूनर ओढ़ जैसे गोरी मुस्काये
चम् चम् तारे उसकी चूनर में पड़े हैं
जरी गोटा नगीने और सितारे जड़े हैं
पूनम का चाँद सितारों का साथ...
जैसे छम छम करती आई बारात
ये है पूर्णिमा की रात...ये है पूर्णिमा की रात..
-रोली पाठक.
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

4 comments:

  1. अरे! वाह ब्लॉग का नया कलेवर -सुन्दर लग रहा है- पर बात इस कविता की, भंगिमा, कंकण जैसे शब्दों ने कविता में गति पैदा कर दी है भंगिमा तो बहुत कम सुनने को आता है सुन्दर शब्द चित्र खींचा है आपने ...."
    प्रणव सक्सैना
    amitraghat.blogspot.com

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  2. आपको नए कलेवर में ब्लॉग पसंद आया, धन्यवाद.
    आपको इनविटेशन भेजा है हमने...कुछ लिखिए!

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  3. जी,बिल्कुल बहुत जल्द, शुक्रिया आपका.......
    प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

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  4. pranava ji .aati sundar rachana dil se aabhar. kavita me kuchh aalag shabdon keprayog ne rochakata paida kar di hai.
    poonam

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