Monday, March 15, 2010

ज़िन्दगी....

एक जिज्ञासा, एक कशमकश, एक अकुलाहट सी है मन में
ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में....

खामोश रहूँ या कुछ बोलूं, शब्दों को वाणी में ढालूं
ये सोच के कुछ-कुछ घबराहट भी है मन में...

बिखरे शब्दों के मोती को, माला में मैंने पिरोया है
पढ़-पढ़ के जब-जब देखा है इनके अर्थों को जाना है
तब से एक अजब किस्म की राहत सी है मन में....

वाणी भी है संवाद भी हैं पर पर शब्द कहीं खोते से हैं
जो शब्द नहीं तो जीवन के अध्याय मेरे रीते से हैं
विचलित है,उद्वेलित है,इक उथल-पुथल सी है मन में..
ज़िन्दगी को लेकर एक सुगबुगाहट सी है मन में....

- रोली पाठक
http://wwwrolipathak.blogspot.com/

1 comment:

  1. "वाणी भी है संवाद भी हैं पर शब्द कहीं खोते से हैं
    जो शब्द नहीं तो जावन के अध्याय मेरे रीते से हैं.." बहुत ही खूबसूरत पँक्तियाँ हैं इस कविता की वाकई में जीवन में मौन की अपनी जगह है पर शब्द तो ईश्वर की भेंट है बाकि ज़िन्दगी तो परिवर्तनशील है...."
    amitraghat.blogspot.com

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