पैर सिकोड़े,मोड़े हाथ सर्दियों में कोई नवजात धूप में लेटाने पर जैसे लेता खुल कर अंगड़ाई है वैसे ही हफ्तों बाद आज धूप आई है... पौधे जो खूब ऊब चुके थे बारिश में पूरा डूब चुके थे सुरमई मेघों के छंटने से सूरज के खुल कर हंसने से दे रहे खुश दिखाई हैं क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आयी है... मुंडेरों पर कपड़े सूख रहे दरवाज़े खिड़की खुल गए कमरे की सीलन सिमट रही हो रही घरों में सफाई है क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आई है... गद्दे भी थे गीले-गीले बिस्तर भी थे सीले-सीले बारिश के निशां दीवारों पर धब्बे जैसे काले-पीले सूरज की गर्मी से सबने अब कुछ राहत पायी है क्योंकि हफ्तों बाद आज धूप आई है... - रोली
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तन्हाई
उसका ज़िक्र जो हम, हर रोज किया करते हैं इस बहाने उसमे हम, खुद को जिया करते हैं उसकी बातें वो मुलाकातें और वो यादें प्यारी यूँ मिला कर ज़हर, अमृत में पिया करते हैं वो दरख़्त, जहाँ दस्तखत आज भी हैं दोनों के देख कर उनको, ज़ख्मे-ए-दिल सिया करते हैं तेरी पायल के टूटे घुंघरू, उठाये थे जो चुपके से अब भी सन्नाटे में वो, छम से बजा करते हैं गैर हो तुम, अब ना रहा हक़ तुम पर मेरा लेकिन इंतज़ार तेरे आने का रोज किया करते हैं ना डर इतना , मुझे भी फिक्र है ज़माने की, खुद रुसवा हो के भी तेरी पर्दानशीनी का ख़याल किया करते हैं......... - रोली ...
परिंदे..............
कितना सूना-सूना सा, ये जहाँ दिखता है... खो गए सारे परिंदे, अब तो बस मुट्ठी भर आसमाँ दिखता है.... ईंट-पत्थर से, बन गए ऊँचे-ऊँचे घरौंदे, अब तो बस झरोखे और मकाँ दिखता है..... ढूंढता हूँ परिंदों को, छत औ चौबारों में, अब ना कहीं उनका, नामो-निशाँ दिखता है.... तिनकों को कचरा कह, फेंक देता है इन्सां, जहाँ उसको, इनका आशियाँ दिखता है...... कहाँ जाये, कहाँ......रहें ये परिंदे, कि हर तरफ इमारतें और इन्सां दिखता है..... खो गया इनका कलरव, खो गई चहचहाहट, अब तो बस मशीनों का,धुंआ दिखता है..... -रोली पाठक

एहसासों को महसूसते खूबसूरत रचना
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है आपने.
ReplyDeleteसादर
bhut khubsurat ehsaaso se bhari rachna... happy mothers day...
ReplyDeleteShukriya Sangeeta ji...Yashwant ji aur Sushma ji...
ReplyDeleteबहुत ही प्यारी कविता.
ReplyDeleteसादर
आभार यशवंत जी......
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