ज़िन्दगी.....

हौले से दबे पाँव, कमरे में मेरे, धूप के एक टुकड़े की तरह, बेआवाज़ वो दाखिल हुयी... अनमना सा अधलेटा, अपने बिछौने पर, कोस रहा था उसे ही, सकपका गया अचानक, उसे देख सामने, फिर उसके सितम याद आने लगे.... तरेर के नज़रें मैंने कहा, -"क्यूँ नहीं करती मुझ पे रहम, क्यों लेती हो हर घडी मेरा इम्तेहान..." वो मुस्कुराई, इठला कर बोली - जो बन जाऊं मै आसान , जीने न देगा तुम्हें ये ज़माना, कठोरता तुम्हें सिखला रही हूँ, अपना हर रूप तुम्हें दिखला रही हूँ, हर रंजो-गम ताकि पी सको, राह के हर दुःख-दर्द में, मुस्कुरा के जी सको.... करते हैं हर वक़्त जो, खुदा की बंदगी, आसां तो नहीं होती उनकी भी ज़िन्दगी... वर्ना पादरी, मौलवी, पंडित, साहूकार होते, आज के रईस भ्रष्टाचारी, उनके कर्ज़दार होते..... मै तुम्हारी "ज़िन्दगी".... तुम्हारी हर तल्ख़ बात सुनती हूँ, फिर भी ख्वाब तुम्हारे लिए, नए, हर रोज़ बुनती हूँ... हर रोज़ बुनती हूँ...